स्थाई लोक अदालत ने हाउसिंग-बोर्ड पर लगाया 42हजार का जुर्माना:सफल बोलीदाता को 2 महीने में दुकानों का पट्टा देने के निर्देश, बोली के बाद हाउसिंग बोर्ड ने नीलामी कर दी थी रद्द
जयपुर महानगर प्रथम की स्थाई लोक अदालत ने नीलामी में सफल बोलीदाता के पक्ष में दुकानों की सेल डीड (विक्रय पत्र) निष्पादित नहीं करने पर हाउसिंग बोर्ड पर 42 हजार रुपए का जुर्माना लगाया हैं। साथ ही हाउसिंग बोर्ड को 2 महीने में दोनों दुकानों को परिवादी के नाम ट्रांसफर करने का निर्देश भी दिया है। यह आदेश अध्यक्ष मनोज कुमार सहारिया और सदस्य बलदेवराज बेनीवाल की बैंच ने अलवर निवासी प्रवीण कुमार शर्मा के परिवाद को निस्तारित करते हुए दिए। परिवाद में कहा गया था कि हाउसिंग बोर्ड ने जयपुर के मानसरोवर में दो कॉमर्शियल दुकानों की नीलामी की सूचना 7 जनवरी 2025 जारी की थी। तय समय पर परिवादी नीलामी प्रक्रिया में शामिल हुआ, उसने बेस प्राइस से ज्यादा की बोली लगाई, नीलामी में उसके अलावा कोई ओर बोलीदाता नहीं होने से उसके पक्ष में बोली स्वीकार हुई। नीलामी की शर्तों की पालना में परिवादी ने पोस्ट इवेन्ट राशि 11.79 लाख रुपए जमा भी करवा दिए। लेकिन उसके पक्ष में दुकानों की सेल डीड नहीं करवाई गई। परिवादी को करीब 5 महीने बाद 20 मई 2025 को सूचना दी गई कि नीलामी में एक मात्र बोलीदाता होने के चलते नीलामी को ही रद्द कर दिया गया है। बोर्ड को रेवेन्यू का नुकसान से बचाया
जवाब में हाउसिंग बोर्ड की ओर से कहा गया कि नीलामी प्रक्रिया में एक ही बोलीदाता होने से प्रतिस्पर्धा नहीं हो सकी। ऐसे में हाउसिंग बोर्ड के 28 जनवरी 2014 के आदेश के बिंदू संख्या-13 में नीलामी समिति को मिले अधिकारों का प्रयोग करते हुए नियमानुसार नीलामी को निरस्त किया गया। इसमें हाउसिंग बोर्ड ने कोई गैर कानूनी और नियम विरूद्ध कार्य नहीं किया हैं, बल्कि बोर्ड को राजस्व हानि से बचाने के लिए नियमानुसार नीलामी को निरस्त किया हैं। नीलामी निरस्त करना अवैध-मनमाना
आदेश में स्थाई लोक अदालत ने कहा कि हाउसिंग बोर्ड की 16 सितंबर 2019 की अधिसूचना में स्पष्ट प्रावधान है कि एकल बोलीदाता होने के आधार पर नीलामी निरस्त नहीं की जाएगी। वहीं बोर्ड के 13 और 17 जनवरी 2025 के आदेश भी इस अधिसूचना की पुष्टि करते हैं। ऐसे में बोर्ड का यह फैसला अपने ही आदेशों व अधिसूचना के विरूद्ध हैं। बोर्ड ने 28 जनवरी 2014 के आदेशों के तहत नीलामी रद्द की। जबकि उसके बाद की अधिसूचना और आदेश इसके खिलाफ हैं। ऐसे में पहले के आदेश को बाद के आदेशों पर वरीयता नहीं दी जा सकती हैं। इसलिए हाउसिंग बोर्ड का नीलामी को निरस्त करना अवैध, अनुचित और मनमाना कृत्य हैं।

