मां के स्वास्थ्य के लिए बेटा कांवड़ लेकर केदारनाथ रवाना:1100KM की यात्रा 40 दिन में होगी पूरी; कहा- सनातन संस्कृति को बढ़ावा देना उद्देश्य

मां स्वस्थ रहे, गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया और सनातन संस्कृति को बढ़ावा देने की मनोकामना को लेकर बुधवार को जूनिया के 22 साल के रोशन गुर्जर केदारनाथ की कांवड़ यात्रा के लिए रवाना हुआ। इस दौरान महादेव मंदिर में पूजा कर सफल यात्रा की कामना की। इस मौके पर ‘केदारनाथ की जय’, ‘राजकलेश्वर बाबा की जय’, ‘गंगा मैया की जय’ और ‘कुरा सती माता की जय’ के जयकारों से मंदिर परिसर गूंज उठा। रोशन गुर्जर ने बताया- 2019 में उनके पिता का हार्ट अटैक से निधन हो गया था। इसके बाद से उनकी मां का स्वास्थ्य लगातार खराब रहने लगा। कई स्थानों पर इलाज कराने के बावजूद स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ। कुछ समय पूर्व उन्होंने भगवान केदारनाथ से मां के स्वस्थ होने की प्रार्थना की थी। उसी संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने यह कांवड़ यात्रा शुरू की है। करीब 1100 किमी की यह यात्रा 35-40 दिन में पूरी होगी। बुधवार सुबह करीब 8 बजे रोशन अपने साथियों कृष गुर्जर और लोकेश लोंदा, प्रिंस गुर्जर समेत करीब 12 साथियों के साथ राजकलेश्वर महादेव मंदिर पहुंचे। यहां विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद कांवड़ में करीब 11 लीटर जल भरकर भगवान राजकलेश्वर एवं बाबा केदारनाथ से मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना की और यात्रा शुरू की। आवां कस्बे में निहाल सोनी, सरदार सिंह माध्यमिक स्कूल के डायरेक्टर महावीर चतुर्वेदी सहित अनेक ग्रामीणों ने साफा एवं माला पहनाकर कांवड़ियों का स्वागत किया। वहीं बुधवार शाम दूनी पहुंचने पर खाटू श्याम मंदिर विकास समिति और श्रद्धालुओं ने भी पुष्पमालाओं से रोशन मीणा का स्वागत किया। रोशन ने बताया कि वह प्रतिदिन 20 से 25 किलोमीटर की पैदल यात्रा करेगा और लगभग 35 से 40 दिनों में केदारनाथ धाम पहुंचकर राजकलेश्वर महादेव के पवित्र जल से भगवान केदारनाथ का अभिषेक करेगा। साथ ही अपने परिवार, गांव, तहसील, जिले एवं प्रदेश की सुख-समृद्धि और खुशहाली की प्रार्थना करेगा। प्राकृतिक पवित्रता के कारण राजकलेश्वर के तालाब से भरे कावड़
रोशन गुर्जर ने बताया कि कांवड़ यात्रा के लिए उन्होंने आवां के प्राचीन राजकलेश्वर महादेव मंदिर के तालाब का जल इसलिए चुना, क्योंकि यह तालाब पहाड़ियों के बीच प्राकृतिक वातावरण में स्थित है और इसमें बारिश के अलावा बाहरी गंदा पानी नहीं आता। इसकी पवित्रता और प्राकृतिक स्वरूप को देखते हुए उन्होंने यहीं से जल भरकर अपनी कांवड़ यात्रा शुरू की है।

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