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ईरान बोला- अमेरिका का MQ-9 ड्रोन मार गिराया:वीडियो भी जारी किया; US ने लगातार 8वीं रात तेहरान पर बम बरसाए

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने खुजेस्तान प्रांत के अहवाज में अमेरिकी MQ-9 रीपर ड्रोन को इंटरसेप्ट कर मार गिराया। ईरानी सरकारी मीडिया ने ड्रोन गिराने का वीडियो भी जारी किया है। IRGC के मुताबिक, उसने अपने नए डिफेंस सिस्टम से ड्रोन को निशाना बनाया। हालांकि अमेरिका ने अब तक न तो ड्रोन गिराए जाने के दावे की पुष्टि की है और न ही जारी वीडियो पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। MQ-9 रीपर अमेरिकी सेना का अत्याधुनिक मानव रहित ड्रोन है, जिसका इस्तेमाल निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और सटीक हवाई हमलों के लिए किया जाता है। दूसरी ओर, अमेरिकी सेना ने कहा है कि उसने लगातार आठवीं रात ईरान के खिलाफ हवाई हमले किए। इससे पहले अमेरिका ने जानकारी दी थी कि जॉर्डन में ईरान के मिसाइल हमले में दो अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, जबकि एक सैनिक लापता है। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. अमेरिका के साथ समझौते से पीछे हटा ईरान: ईरान ने अमेरिका के साथ एक महीने पहले हुए समझौते से पीछे हटने का ऐलान किया है। ईरान के उप विदेश मंत्री ने कहा कि अमेरिका ने खुद समझौते का उल्लंघन किया, इसलिए वे भी उसकी शर्तों का पालन नहीं करेंगे। 2. अमेरिकी हमलों में 50 लोगों की मौत, 500 घायल: ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने दावा किया है कि 27 जून से 18 जुलाई के बीच अमेरिकी हवाई हमलों में 50 लोगों की मौत हुई है, जबकि 500 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। 3. जंग में डिसैलिनेशन प्लांट बने निशाना: कुवैत ने दावा किया कि ईरान ने उसके एक डिसैलिनेशन प्लांट पर हमला किया है। वहीं, ईरान ने भी दावा किया कि अमेरिका ने ईरान के होर्मोजगान में एक डिसैलिनेशन प्लांट पर हमला किया है। 4. अमेरिकी हमलों में दो पुल क्षतिग्रस्त: अमेरिकी हमले में बंदर अब्बास-रूदान मार्ग पर स्थित दो पुल बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं। साथ ही, जस्क के पास एक इलाके पर भी सैन्य हमला हुआ। 5. होर्मुज में जहाजों की आवाजाही निचले स्तर पर: होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की संख्या तीन हफ्तों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। शिप ट्रैकिंग वेबसाइट मरीन ट्रैफिक के मुताबिक, गुरुवार को स्ट्रेट से सिर्फ 8 जहाज गुजरे। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…

अमेरिका से 18 हजार भारतीय डिपोर्ट होंगे:अपील, दलील या वकील करने का मौका नहीं; ट्रम्प सरकार ने 2025 में भारतीयों को हथकड़ी-बेड़ियां पहनाकर भेजा था

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने डिपोर्टेशन का बड़ा अभियान छेड़ने की तैयारी कर ली है। अमेरिका में 18 हजार अनडॉक्युमेंटेड (बिना दस्तावेज) भारतीय निशाने पर आ गए हैं। इस बार भी ट्रम्प प्रशासन डिपोर्टेशन के लिए सैन्य विमानों के इस्तेमाल की तैयारी में है, जो उनकी सख्त इमिग्रेशन नीति की सबसे चर्चित तस्वीर बन चुका है। अनडॉक्युमेंटेड भारतीयों को न अपील, न दलील और न ही वकील करने का मौका मिलेगा। ट्रम्प की आईसीई (इमिग्रेशन कस्टम्स एंड एनफोर्समेंट) की टीमें लगातार छापे मार रही हैं। भास्कर ने अमेरिका के 4 शहरों- न्यूयॉर्क, टेक्सास, कैलिफोर्निया और न्यूजर्सी—से ग्राउंड रिपोर्ट की। इसमें सामने आया कि डिपोर्टेशन अभियान ने बिना दस्तावेज वाले भारतीयों की जिंदगी पूरी तरह बदल दी है। डिटेंशन सेंटर में बंद लोगों के साथ दुर्व्यवहार की कहानियां भी सामने आईं। डिपोर्टेशन के लिए दो नए डिटेंशन सेंटर तैयार ट्रम्प प्रशासन ने डिपोर्ट किए जाने वाले प्रवासियों को रखने के लिए एल पासो में एक और कैलिफोर्निया में दो वेयरहाउस खरीदे हैं। इन पर करीब 16,500 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। इन्हें डिटेंशन सेंटर में बदलकर आईसीई को सौंप दिया गया है। यहां करीब 12 हजार प्रवासियों को रखा जा रहा है। वकील बोले- पहले सुनवाई होती थी, अब सीधे डिटेंशन सेंटर भेजा जा रहा न्यूयॉर्क के इमिग्रेशन अटॉर्नी ग्रेग सिस्किंड कहते हैं, “मैं 30 साल से प्रवासियों के केस लड़ता रहा हूं। बिना दस्तावेज वाले किसी भी प्रवासी को अपना पक्ष रखने का मौका मिलता है, लेकिन अब आईसीई के छापों के बाद लोगों को सीधे डिटेंशन सेंटर भेजा जा रहा है।” उनका कहना है कि अमेरिका में संघीय व्यवस्था के कारण हर राज्य में मानवाधिकारों से जुड़े अलग-अलग कानून हैं, लेकिन आईसीई किसी भी राज्य में जाकर कार्रवाई कर रही है। 2025 में 3,567 भारतीय अमेरिका से डिपोर्ट हुए थे 2025 में अमेरिका ने 3,567 भारतीय नागरिकों को डिपोर्ट किया था। यह जानकारी भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने जून 2026 में दी थी। विदेश मंत्रालय ने बताया कि 2026 में जून तक 1,076 भारतीयों को डिपोर्ट किया गया है। 5 फरवरी 2025 को अमेरिका ने पहली बार सैन्य विमान से 104 भारतीयों को अमृतसर भेजा था। इस दौरान कई लोगों को हथकड़ी और पैरों में बेड़ियां लगी थीं। इसकी तस्वीरें सामने आने के बाद देशभर में विवाद हुआ। संसद में भी हंगामा हुआ था। ———————————— अमेरिका-भारत से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… अमेरिकी सांसद बोले-भारत से 30 साल में सबसे खराब रिश्ते:ट्रम्प के एकतरफा फैसले ने भरोसा तोड़ा, यकीन न हो तो जयशंकर से पूछिए भारतीय मूल के अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसद रो खन्ना ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों की वजह से भारत और अमेरिका के रिश्ते पिछले 30 साल में सबसे खराब दौर में पहुंच गए हैं।वॉशिंगटन में आयोजित यूएस-इंडिया स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप फोरम (USISPF) लीडरशिप समिट 2026 में उन्होंने कहा कि ट्रम्प की टैरिफ नीति, ईरान के साथ युद्ध और सहयोगी देशों से बिना सलाह लिए फैसले करने से अमेरिका की साख को नुकसान पहुंचा है। पूरी खबर पढ़ें…

दावा-खामेनेई के अंतिम संस्कार में विदेश मंत्री को पत्थर मारे:ईरानी राष्ट्रपति को गालियां दीं; कट्टरपंथियों का आरोप- सरकार अमेरिका के सामने झुकी

अमेरिका के साथ युद्धविराम समझौते के बाद ईरान के भीतर राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आ गया है। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ पर अब ईरान के कट्टरपंथी धड़े ‘सॉफ्ट कूप’ यानी बिना हथियारों के सत्तापलट करने का आरोप लगा रहे हैं। कट्टरपंथियों का कहना है कि इन नेताओं ने अमेरिका से समझौता करके ईरान के सिद्धांतों से समझौता किया है। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले सप्ताह तेहरान में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान यह नाराजगी खुलकर दिखाई दी। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान जब खामेनेई के ताबूत के साथ चल रहे थे, तब काले कपड़े पहने कुछ लोगों ने राष्ट्रपति के खिलाफ नारे लगाए। वहीं, अंतिम संस्कार स्थल से कुछ दूरी पर विदेश मंत्री अब्बास अराघची पर पत्थर फेंके गए और उन्हें देश बेचने वाला गद्दार कहा गया। हालात इतने बिगड़ गए कि उन्हें वहां से भागना पड़ा। कट्टरपंथियों का आरोप- अमेरिका के सामने सरकार झुक गई CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, कट्टरपंथी गुटों का मानना है कि अली खामेनेई की हत्या का बदला लेने के बजाय सरकार ने अमेरिका के सामने झुककर समझौता कर लिया। उनका कहना है कि यह समझौता नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई के आदेशों के खिलाफ किया गया। मुजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। उन्होंने न तो देश को संबोधित किया है और न ही खुलकर अपनी सत्ता का प्रदर्शन किया है, जबकि उनके नाम पर सरकार बातचीत भी कर रही है और देश भी चला रही है। कट्टरपंथियों का आरोप है कि मुजतबा की गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर मौजूदा सरकार अपनी ताकत बढ़ाने में लगी है। उनका दावा है कि वे संसद को कमजोर करना चाहती है। मुजतबा खामेनेई के लगातार सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने के कारण राष्ट्रपति मसूद पजशकियान, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची युद्ध के बाद ईरान के सबसे प्रमुख चेहरे बन गए हैं। कट्टरपंथियों की नाराजगी की एक बड़ी वजह यही है। अंतिम संस्कार में जंग का संदेश, कुछ दिन बाद ही टूट गया युद्धविराम ईरान में युद्ध के दौरान राष्ट्रीय एकता बनाए रखने की लगातार अपील की जा रही थी, लेकिन अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में कट्टरपंथी गुटों का दबदबा साफ दिखाई दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, कट्टरपंथी गुटों ने इस मौके का इस्तेमाल अमेरिका के खिलाफ फिर से युद्ध छेड़ने की मांग उठाने और ट्रम्प सरकार के साथ हुए किसी भी समझौते को पूरी तरह खारिज करने के लिए किया। कट्टरपंथियों की यह इच्छा कुछ ही दिनों बाद पूरी होती नजर आई। इस सप्ताह ईरान और अमेरिका के बीच हुआ नाजुक युद्धविराम लगभग टूट गया। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों को निशाना बनाकर इस समुद्री मार्ग पर अपना कंट्रोल दिखाने की कोशिश की। इसके जवाब में अमेरिका ने जवाबी हमले किए। राष्ट्रपति को खुलेआम दी गई थी जान से मारने की धमकी युद्ध दोबारा शुरू होने से पहले भी कट्टरपंथी नेता अमेरिका से समझौता करने वाले अधिकारियों पर लगातार हमला बोल रहे थे। ईरानी शासन से जुड़े धार्मिक गायक मोहम्मद अली बख्शी ने एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति मसूद पजशकियान को खुलेआम धमकी दी थी। उन्होंने कहा- राष्ट्रपति महोदय, अगर सुप्रीम लीडर की शर्तें पूरी नहीं हुईं तो हमारी तलवार होगी और आपका गला होगा। हम आपकी जिंदगी को जहन्नुम बना देंगे। राष्ट्रपति को जान से मारने की इस धमकी की ईरान में काफी आलोचना हुई, लेकिन बख्शी के खिलाफ किसी कानूनी कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई। गालिबाफ भी कट्टरपंथियों के निशाने पर कट्टरपंथियों के निशाने पर सिर्फ राष्ट्रपति और विदेश मंत्री ही नहीं हैं। अमेरिका के साथ बातचीत करने वाले मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ भी उनके निशाने पर हैं। गालिबाफ पहले रिवोल्यूशनरी गार्ड्स में कमांडर रह चुके हैं और लंबे समय से ईरान की राजनीति में सक्रिय हैं। कट्टरपंथी सांसद कमरान गजनफारी ने जुलाई की शुरुआत में जारी एक वीडियो मैसेज में आरोप लगाया कि मौजूदा नेतृत्व सर्वोच्च नेता और संसद की भूमिका कमजोर कर रहा है। कट्टरपंथियों को किनारे करने की कोशिश तेज ईरान में करीब चार महीने बाद 14 जुलाई को संसद का विशेष सत्र बुलाया गया। इसमें सत्ता संघर्ष खुलकर सामने आया और अमेरिका के साथ हुए समझौते का विरोध करने वाले दो प्रमुख कट्टरपंथी सांसदों को अहम संसदीय पदों से हटा दिया गया। सबसे पहले अमेरिका से समझौते का सबसे ज्यादा विरोध करने वाले कट्टरपंथी सांसद महमूद नबावियन को संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग (नेशनल सिक्योरिटी कमीशन) से हटा दिया गया। इसके अलावा इसके प्रवक्ता रहे इब्राहिम रेजाई को भी हटा दिया गया। नबावियन पहले अमेरिका के साथ बातचीत करने वाले ईरानी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा रह चुके हैं, लेकिन बाद में उन्होंने वार्ता का विरोध शुरू कर दिया। आरोप है कि उन्होंने पिछले महीने समझौते पर हस्ताक्षर होने से पहले उसका मसौदा मीडिया में लीक कर दिया था, ताकि समझौता रुक सके। विशेषज्ञ बोले- सरकार कट्टरपंथियों का असर कम करना चाहती है एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान की मौजूदा सरकार अब इन कट्टरपंथी गुटों का प्रभाव कम करने की कोशिश कर रही है। हामिदरेजा अजीजी ने CNN से कहा- हम देख रहे हैं कि गालिबाफ इन कट्टरपंथी नेताओं को धीरे-धीरे किनारे कर रहे हैं। ये लोग अब व्यवस्था के लिए बोझ बन चुके हैं और देश में अस्थिरता बढ़ने के साथ अपनी आपसी लड़ाई भी खुलकर सामने ला रहे हैं। हालांकि इन कट्टरपंथियों की संख्या ज्यादा नहीं है, लेकिन संसद और सरकारी न्यूज एजेंसीज आईआरआईबी (IRIB) जैसे कई प्रभावशाली संस्थानों में उनकी मजबूत पकड़ है। इनकी वास्तविक राजनीतिक ताकत कितनी है, यह साफ नहीं है। इस धड़े के प्रमुख नेता और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख सईद जलीली को 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में 1.3 करोड़ से ज्यादा वोट मिले थे। वे चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे थे। ईरान की कुल आबादी करीब 9.3 करोड़ है। ट्रम्प ने कहा था- ईरान भीतर से बंटा हुआ है युद्ध और कूटनीतिक बातचीत के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कई बार कह चुके हैं कि ईरान का नेतृत्व गंभीर अंदरूनी मतभेदों से जूझ रहा है और यही किसी समझौते में सबसे बड़ी बाधा है। हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार और कट्टरपंथियों के बीच मतभेद जरूर हैं, लेकिन पूरे शासन की प्राथमिकता अब भी एक जैसी है। उनका लक्ष्य ऐसा समझौता करना है जिससे युद्ध खत्म हो, ईरान को प्रतिबंधों से राहत मिले और होर्मुज स्ट्रेट पर उसका प्रभाव भी बना रहे। अमेरिका से फिर जंग चाहते हैं कट्टरपंथी CNN के अनुसार, मुजतबा खामेनेई का लगातार सार्वजनिक रूप से सामने न आना, युद्धविराम को लेकर उनका सीमित समर्थन, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का बढ़ता प्रभाव और अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में जुटी भारी भीड़ ने कट्टरपंथियों का मनोबल बढ़ा दिया है। अब वे अमेरिका और इजराइल के खिलाफ युद्ध जारी रखने की खुलकर मांग कर रहे हैं। ईरान के पूर्व विदेश मंत्री और कट्टरपंथी नेता मनूचेहर मुत्ताकी ने बुधवार को एक टीवी इंटरव्यू में कहा, मेरा सुझाव है कि हम क्षेत्र में मौजूद अमेरिका के किसी सैन्य अड्डे पर जाएं, जहां सैकड़ों या शायद हजारों अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। अगर हम उनमें से 100 सैनिकों को पकड़कर ईरान ले आएं, तो इतना ही काफी होगा। यह बयान दिखाता है कि अमेरिका के साथ हुए समझौते के बावजूद ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष खत्म नहीं हुआ है। एक तरफ सरकार कूटनीतिक रास्ते से प्रतिबंधों में राहत और युद्ध खत्म करने की कोशिश कर रही है, वहीं कट्टरपंथी धड़े अब भी अमेरिका और इजराइल के खिलाफ टकराव की नीति पर अड़े हुए हैं। इससे आने वाले समय में ईरान की आंतरिक राजनीति और विदेश नीति दोनों पर बड़ा असर पड़ सकता है। —————————– ईरान से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका का लगातार सातवीं रात ईरान पर हमला:भारत के निवेश वाले चाबहार पोर्ट पर अटैक; ईरान ने कतर-कुवैत पर दागीं मिसाइलें अमेरिका ने शनिवार को लगातार सातवीं रात ईरान पर एयरस्ट्राइक की। इन हमलों में पुल, एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और भारत के निवेश वाले चाबहार पोर्ट का एक कंट्रोल (निगरानी) टावर निशाना बना। जवाब में ईरान ने कतर, कुवैत, बहरीन और जॉर्डन की ओर मिसाइलें दागीं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

पाकिस्तान में पेट्रोल 5.44 और डीजल 31.05 रुपया महंगा:पेट्रोल 316.15 और हाई-स्पीड डीजल 354.35 रुपया लीटर मिल रहा, नई कीमतें 18 जुलाई से लागू

पाकिस्तान सरकार ने पेट्रोल के दाम में 5.44 रुपया (पाकिस्तानी रुपया) प्रति लीटर और हाई-स्पीड डीजल में 31.05 रुपया प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। इस बढ़ोतरी के बाद पाकिस्तान में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 316.15 रुपया और हाई-स्पीड डीजल की कीमत 354.35 रुपया लीटर हो गई है। नई कीमतें 18 जुलाई से लागू हो गई हैं। इसके अलावा सरकार ने अब पेट्रोल-डीजल की कीमतें साप्ताहिक की जगह रोजाना तय करने का फैसला किया है। फरवरी से शुरू हुआ था बढ़ने का सिलसिला हालिया बढ़ोतरी के बावजूद दोनों ईंधन अपनी रिकॉर्ड ऊंचाई (पीक लेवल) से नीचे बने हुए हैं। 3 अप्रैल को डीजल की कीमत 520.35 रुपया प्रति लीटर के ऑल-टाइम हाई स्तर पर पहुंच गई थी। ईंधन की कीमतों में यह तेजी 28 फरवरी को अमेरिका-ईरान युद्ध शुरू होने के बाद देखने को मिली थी, जब डीजल 281 रुपया प्रति लीटर के स्तर पर था। वहीं दूसरी ओर, पेट्रोल की कीमत भी 3 अप्रैल को 458.41 रुपया के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी, जिसकी शुरुआत मार्च के पहले हफ्ते में 266 रुपया प्रति लीटर से हुई थी। अब हर रोज तय होंगे दाम पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच जंग के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बदल रही हैं। इसे देखते हुए केंद्रीय कैबिनेट और प्रधानमंत्री ने फैसला किया है कि अब ऑयल एंड गैस रेगुलेटरी अथॉरिटी (OGRA) को रोजाना कीमतें तय करने की जिम्मेदारी दी जाएगी। OGRA न सिर्फ अपनी वेबसाइट पर रोज सुबह नए रेट जारी करेगी, बल्कि यह भी सार्वजनिक करेगी कि पेट्रोल पंप तक पहुंचते-पहुंचते टैक्स, मार्जिन और अन्य खर्चों की वजह से कीमतें किस तरह तय हुईं। इससे पहले मार्च की शुरुआत से सरकार हर हफ्ते कीमतों की समीक्षा कर रही थी। एक लीटर तेल पर 105 रुपया तो सिर्फ टैक्स, डीलर्स ने दी आंदोलन की चेतावनी आम जनता को मिलने वाले पेट्रोल-डीजल पर सरकार भारी-भरकम टैक्स वसूल रही है। इस समय दोनों पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स पर प्रति लीटर लगभग 105 रुपया का टैक्स लिया जा रहा है। इसमें कस्टम ड्यूटी, पेट्रोलियम लेवी, क्लाइमेट सपोर्ट लेवी और इनलैंड फ्रेट इक्वलाइजेशन मार्जिन शामिल हैं। दूसरी ओर, ऑल पाकिस्तान डीलर्स एसोसिएशन ने सरकार के ‘डेली प्राइसिंग’ यानी रोज दाम बदलने के फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। एसोसिएशन का कहना है कि रोज दाम बदलने से उनके बिजनेस और स्टॉक मैनेजमेंट में दिक्कतें आएंगी। डीलर्स ने चेतावनी दी है कि वे इसके खिलाफ अगले हफ्ते एक बड़ा विरोध प्रदर्शन और हड़ताल कर सकते हैं। मिडिल क्लास और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर पेट्रोल की कीमतों में बदलाव का सीधा असर देश के मिडिल और लोअर-मिडिल क्लास पर पड़ता है, क्योंकि इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से प्राइवेट गाड़ियों, छोटी कारों, ऑटो रिक्शा और टू-व्हीलर्स में होता है। वहीं, डीजल महंगा होने से पूरे देश में महंगाई बढ़ने का खतरा है, क्योंकि इसका इस्तेमाल भारी कमर्शियल वाहनों (ट्रकों-बसों), पावर प्लांट्स और बड़े जनरेटरों में होता है। पाकिस्तान में हर महीने करीब 7 से 8 लाख टन पेट्रोल और डीजल की भारी-भरकम बिक्री होती है, जबकि केरोसिन (मिट्टी के तेल) की मासिक मांग सिर्फ 10 हजार टन ही है। यही वजह है कि पेट्रोल-डीजल सरकार के लिए रेवेन्यू जुटाने का सबसे बड़ा जरिया बने हुए हैं।

दावा- होर्मुज स्ट्रेट में दो तेल टैंकरों में विस्फोट:US का लगातार सातवीं रात ईरान पर हमला; ईरान बोला- जमीनी हमले हुए तो कुवैत-बहरीन में घुस जाएंगे

ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट में दो तेल टैंकरों में विस्फोट हुआ है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की गलत जानकारी के कारण टैंकरों ने उस मार्ग से गुजरने की कोशिश की जहां समुद्र में माइंस बिछी थीं। इससे टकराने के बाद दोनों जहाजों में भीषण आग लग गई। हालांकि अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इस दावे को गलत बताया है। CENTCOM ने सोशल मीडिया पोस्ट पर लिखा, ‘IRGC के कई दावों की तरह ये दावा भी झूठा है।’ वहीं, CENTCOM ने बताया कि उसने शुक्रवार देर रात ईरान पर लगातार सातवीं रात सैन्य हमले किए। इसमें ईरान के निगरानी ठिकानों, सैन्य लॉजिस्टिक ढांचे, भूमिगत हथियार भंडार और समुद्री सैन्य क्षमताओं को निशाना बनाया गया। अल जजीरा के मुताबिक, सीरिक, बुशेहर, बंदर अब्बास, केश्म द्वीप और मध्य ईरान के यज्द शहर पर हमले हुए हैं। उधर, ईरानी सांसद अहमद बख्शायेश अर्देस्तानी ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने ईरान पर जमीनी हमला किया, तो ईरान कुवैत और बहरीन में घुस जाएगा और वहां अमेरिकी सैन्य ठिकानों और सेना को तबाह कर देगा। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…

मेक्सिको में 7.4 तीव्रता का भूकंप, सुनामी का खतरा बढ़ा:10 लाख लोगों के लिए अलर्ट जारी, पड़ोसी देशों में भी महसूस हुए झटके

मेक्सिको के दक्षिणी राज्य चियापास के तट पर शुक्रवार को 7.4 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया। इसके बाद करीब 10 लाख लोगों के लिए सुनामी का अलर्ट जारी किया गया है। अमेरिकी एजेंसी USGS के मुताबिक, भूकंप का केंद्र मेक्सिको के प्यूर्टो मडेरो शहर के पास था। यह 10 किलोमीटर की गहराई पर आया, जिससे आसपास के इलाकों में तेज झटकों की आशंका बढ़ गई है। US सुनामी वार्निंग सिस्टम ने इस क्षेत्र के लिए सुनामी का अलर्ट जारी किया है। 7.4 तीव्रता के भूकंप को ‘मेजर’ कैटेगरी में रखा जाता है, जो बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकते हैं। भूकंप के झटके मेक्सिको के पड़ोसी देश ग्वाटेमाला और अल साल्वाडोर में भी महसूस किए गए। फिलहाल किसी के हताहत होने या बड़े नुकसान की कोई रिपोर्ट नहीं है। सोशल मीडिया पर भूकंप से जुड़ा यह वीडियो वायरल है… 300 किमी के दायरे में सुनामी का खतरा अधिकारियों ने चेतावनी दी कि भूकंप के केंद्र से करीब 300 किलोमीटर के दायरे में खतरनाक सुनामी लहरें उठ सकती हैं। सुनामी अलर्ट मुख्य रूप से 3 इलाकों के लिए जारी किया गया है: चियापास का दक्षिणी प्रशांत तट ओआक्साका के तटीय इलाके ग्वाटेमाला से लगे प्रशांत तटीय क्षेत्र प्रशासन ने लोगों से समुद्र तट और निचले तटीय इलाकों से दूर रहने की अपील की है। मेक्सिको-ग्वाटेमाला सीमा पर स्थित सुचियाते में समुद्र के जलस्तर पर लगातार नजर रखी जा रही है। पिछले 30 दिनों में 22 भूकंप दर्ज भूकंप ‘पैसिफिक रिंग ऑफ फायर’ में आया, जो प्रशांत महासागर के चारों ओर फैला करीब 40 हजार किलोमीटर लंबा घोड़े की नाल के आकार का इलाका है। यह दुनिया का सबसे एक्टिव भूकंपीय क्षेत्र माना जाता है। यहां दुनिया के करीब 75% सक्रिय और निष्क्रिय ज्वालामुखी हैं और लगभग 90% भूकंप इसी क्षेत्र में आते हैं। पिछले 30 दिनों में इस इलाके में 22 भूकंप दर्ज किए गए हैं। इनमें शुक्रवार का 7.4 तीव्रता वाला भूकंप सबसे शक्तिशाली बताया जा रहा है। भूकंप के तुरंत बाद अधिकारियों ने कहा कि समुद्र में उठने वाली ऊंची और खतरनाक लहरें तटीय इलाकों में बाढ़ ला सकती हैं। लोगों से संभावित बाढ़, तेज समुद्री धाराओं और ऊंची लहरों को देखते हुए सतर्क रहने की अपील की गई है। हालांकि, अमेरिका के नेशनल सुनामी वार्निंग सेंटर ने साफ किया है कि अमेरिका के पश्चिमी तट, ब्रिटिश कोलंबिया और अलास्का के लिए सुनामी का कोई खतरा नहीं है। भूकंप क्यों आते हैं
हमारी धरती की सतह मुख्य तौर पर 7 बड़ी और कई छोटी-छोटी टेक्टोनिक प्लेट्स से मिलकर बनी है। ये प्लेट्स लगातार तैरती रहती हैं और कई बार आपस में टकरा जाती हैं।

टकराने से कई बार प्लेट्स के कोने मुड़ जाते हैं और ज्‍यादा दबाव पड़ने पर ये प्‍लेट्स टूटने लगती हैं। ऐसे में नीचे से निकली ऊर्जा बाहर की ओर निकलने का रास्‍ता खोजती है और इस डिस्‍टर्बेंस के बाद भूकंप आता है। ——————————- भूकंप से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… वेनेजुएला में फिर भूकंप के झटके, अब तक 1430 मौतें:करीब 3300 घायल, 51 हजार लापता; लोग खुद मलबा हटाकर अपनों को तलाश रहे
दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में 25 जून को आए दो भूकंप के बाद स्थानीय समयानुसार शुक्रवार दोपहर को एक और भूकंप आया। देश के उत्तरी तट के पास आए इस भूकंप की तीव्रता 4.9 मापी गई है। रॉयटर्स के मुताबिक, राजधानी कराकास और माराके में भी झटके महसूस किए गए। पूरी खबर यहां पढ़ें…

गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का 5वां राज्य बनाने की तैयारी:विधानसभा में प्रस्ताव पास, संसद से संविधान संशोधन की मांग

पाकिस्तान ने अपने अवैध कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान को देश का पांचवां राज्य (प्रांत) बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। गुरुवार को गिलगित-बाल्टिस्तान विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से संविधान में संशोधन करके इस क्षेत्र को राज्य का दर्जा देने की मांग की। प्रस्ताव में कहा गया है कि गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों को पाकिस्तान के दूसरे राज्यों के नागरिकों की तरह समान संवैधानिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक अधिकार दिए जाएं। इसके साथ ही इस क्षेत्र को नेशनल असेंबली, सीनेट और अन्य संघीय संवैधानिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व देने की भी मांग की गई है। प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री, स्पीकर, डिप्टी स्पीकर, नेता विपक्ष और दो निर्दलीय विधायकों के हस्ताक्षर हैं। अब इसे आगे की मंजूरी के लिए पाकिस्तान की संसद भेजा जाएगा। प्रस्ताव में क्या-क्या है? फिलहाल पाकिस्तान में चार ही राज्य हैं- पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा। गिलगित-बाल्टिस्तान अब तक सीमित स्वशासन के तहत संचालित होता रहा है और उसे पाकिस्तान के अन्य राज्यों जैसा संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है। प्रस्ताव में कहा गया है कि गिलगित-बाल्टिस्तान को अभी स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी (प्रोविजनल) तौर पर राज्य बनाया जाएगा। अगर भविष्य में जम्मू-कश्मीर विवाद का कोई समाधान निकलता है, तो उसके अनुसार इस क्षेत्र की स्थिति दोबारा तय की जा सकेगी। इसके साथ ही प्रस्ताव में यह भी मांग की गई है कि जब तक गिलगित-बाल्टिस्तान को राज्य का दर्जा नहीं मिलता, तब तक पाकिस्तान की केंद्र सरकार और चारों राज्य यह सुनिश्चित करें कि इस क्षेत्र को भी सरकारी फंड और राष्ट्रीय संसाधनों में उचित हिस्सा मिले। यानी गिलगित-बाल्टिस्तान को भी दूसरे राज्यों की तरह विकास के लिए धन दिया जाए। गिलगित-बाल्टिस्तान का राज्य बनना कितना मुश्किल? पाकिस्तान लंबे समय से कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर विवाद का अंतिम समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्तावों के अनुसार जनमत संग्रह (प्लेबिसाइट) के जरिए होना चाहिए। पाकिस्तान के मुताबिक, गिलगित-बाल्टिस्तान भी इसी विवादित क्षेत्र का हिस्सा है। इसी वजह से विशेषज्ञों का मानना है कि विधानसभा से प्रस्ताव पास होने के बावजूद गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का स्थायी पांचवां राज्य बनाना आसान नहीं होगा। ऐसा करने पर पाकिस्तान के उस पुराने रुख पर सवाल उठ सकते हैं, जिसमें वह कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताता रहा है। यही कारण है कि प्रस्ताव में केवल अस्थायी (प्रोविजनल) राज्य बनाने की बात कही गई है। गिलगित-बाल्टिस्तान को 2009 में पहली बार मिली विधानसभा 1947 से लेकर कई दशकों तक गिलगित-बाल्टिस्तान का प्रशासन सीधे पाकिस्तान की केंद्र सरकार के हाथ में रहा। यहां न तो प्रांत का दर्जा था और न ही लोगों को अपने प्रतिनिधियों के जरिए शासन चलाने का अधिकार मिला था। 2009 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान एम्पावरमेंट एंड सेल्फ-गवर्नेंस ऑर्डर लागू किया। इसके तहत पहली बार यहां विधानसभा चुनाव कराए गए और स्थानीय सरकार बनाई गई। हालांकि विधानसभा के अधिकार सीमित थे और बड़े फैसले केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के हाथ में ही रहे। इसके बाद 2018 में गिलगित-बाल्टिस्तान ऑर्डर-2018 लागू किया गया, जिसके तहत स्थानीय विधानसभा और मुख्यमंत्री को पहले से ज्यादा अधिकार दिए गए। इसके बावजूद गिलगित-बाल्टिस्तान आज तक पाकिस्तान का संवैधानिक राज्य नहीं बन सका। गिलगित-बाल्टिस्तान और भारत का क्या संबंध है? गिलगित-बाल्टिस्तान ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में कश्मीर घाटी के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। यह कभी जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा था। उस समय रियासत पांच हिस्सों में बंटी थी- जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, गिलगित वजाहत और गिलगित एजेंसी। आज पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर क्षेत्र का करीब 85% हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान (नॉर्दर्न एरियाज) में है, जबकि लगभग 15% हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) कहलाता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भी इसी इलाके से होकर गुजरता है। पाकिस्तान की जीवनरेखा मानी जाने वाली सिंधु नदी भी सबसे पहले इसी क्षेत्र में प्रवेश करती है। गिलगित-बाल्टिस्तान भारत से अलग कैसे हुआ? पाकिस्तान ने इसे संविधान में क्यों शामिल नहीं किया? 2009 के बाद प्रशासनिक व्यवस्था कैसे बदली? साल 2000 के बाद, खासकर अमेरिका में 9/11 हमलों और चीन के वन बेल्ट वन रोड (अब बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) परियोजना में इस इलाके की बढ़ती रणनीतिक अहमियत को देखते हुए पाकिस्तान ने यहां प्रशासनिक बदलाव शुरू किए। 2009 के ऑर्डर के तहत नॉर्दर्न एरियाज लेजिस्लेटिव काउंसिल (NALC) की जगह गिलगित-बाल्टिस्तान लेजिस्लेटिव असेंबली बनाई गई और नॉर्दर्न एरियाज का नाम बदलकर गिलगित-बाल्टिस्तान कर दिया गया। हालांकि विधानसभा बनने के बाद भी अंतिम अधिकार इस्लामाबाद के पास ही रहे। नई विधानसभा में 24 सदस्य सीधे चुने जाते हैं और 9 सदस्य नामित किए जाते हैं। 2010 के बाद से हर चुनाव में इस्लामाबाद में सत्ता में रहने वाली पार्टी ही यहां सरकार बनाती रही है। नवंबर 2020 के चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने 33 में से 24 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी।

जापान में 780 साल पुराना पारंपरिक उत्सव:1 हजार किलो की झांकी उठाकर दौड़े युवा; 10 लाख पर्यटक जुटे

जापान के फुकुओका शहर में महामारियों से बचाव के लिए ‘हाकाता गियन यामाकासा’ उत्सव हुआ। इसकी शुरुआत 1241 में मानी जाती है। मान्यता है कि महामारी के दौरान बौद्ध भिक्षु शूइची कोकुशी (एन्नी) ने पूरे शहर में पवित्र जल का छिड़काव किया, जिसके बाद बीमारी थम गई। उसी घटना की स्मृति में यह परंपरा शुरू हुई। यह उत्सव यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज है। इसे देखने के लिए करीब 10 लाख पर्यटक जुटे। उत्सव में दो तरह की झांकियां होती हैं। काजारीयामा करीब 10 मीटर ऊंचे, भव्य और सजावटी झांकी होती हैं, जिन्हें केवल प्रदर्शन के लिए रखा जाता है। वहीं काकियामा करीब 1 टन वजन की झांकी होती है, जिन्हें पुरुषों के समूह कंधों पर उठाकर शहर की सड़कों पर दौड़ते हैं। इन्हें बनाने में 55 लाख से 2 करोड़ रुपए तक खर्च होते हैं। इसके अलावा पारंपरिक पोशाक और अन्य व्यवस्थाओं पर भी लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। गर्मी की वजह से रास्ते में खड़े लोग धावकों पर ठंडा पानी डालते हैं। इससे शरीर ठंडा रहता है और धावकों का उत्साह भी बढ़ता है। दौड़ में हिस्सा लेने वाले पुरुष केवल पारंपरिक सूती जैकेट (मिजू-हैप्पी) और शिमेकोमी नामक विशेष लंगोट पहनते हैं। ऐसा इसलिए ताकि पानी पड़ने के बाद कपड़े भारी न हों और दौड़ने में आसानी रहे।

इंडियन बुलेट-ट्रेन प्रोजेक्ट लेट होने से पूर्व जापानी मंत्री नाराज:कहा- हमने मेहनत की, लेकिन भारतीय मंत्री का रवैया खराब, वादों-शर्तों से पलटे

भारत के बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में देरी होने पर जापान के पूर्व न्याय मंत्री हिदेकी माकिहारा ने भारत पर ही गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया X पर लिखा कि देरी की सबसे बड़ी वजह भारतीय मंत्री का रवैया रहा। माकिहारा ने कहा- मैं खुद प्रोजेक्ट से जुड़ा रहा। जापानी टीम ने पूरी मेहनत की, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले। भारतीय पक्ष ने वादे पूरे नहीं किए, समझौतों से पीछे हट गए। अपने हिसाब से शर्तें बदलते रहे। इसी वजह से प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ा। माकीहारा ने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर यह बात कही। पीएम नरेंद्र मोदी और जापानी के पूर्व PM शिंजो आबे ने 14 सितंबर 2017 में इस प्रोजेक्ट का इनॉगरेशन किया था। भारतीय विदेश मंत्रालय ने माकीहारा के बयान पर कहा- भारत और जापान के बीच बातचीत अच्छी तरह आगे बढ़ रही है। जापान की पीएम के दौरे का भी असर नहीं- माकिहारा माकिहारा के मुताबिक, जापान की प्रधानमंत्री के दौरे से भी कोई नतीजा नहीं निकला। प्रधानमंत्री साने ताकाइची 1-3 जुलाई 2026 में भारत दौरे पर आई थी। इस दौरान दोनों देशों ने 129 समझौतों का ऐलान किया था। इन समझौतों का मकसद निवेश, उद्योग, मैन्युफैक्चरिंग, तकनीक, कौशल विकास और सप्लाई चेन सहयोग को मजबूत करना है। माकिहारा ने पोस्ट में टॉयो केइजाई ऑनलाइन की रिपोर्ट भी शेयर की। इसमें दावा किया गया कि बुलेट ट्रेन के सबसे अहम सेफ्टी सिस्टम (सिग्नलिंग सिस्टम) में जापान को शामिल नहीं किया गया। माकीहारा ने कहा कि इस प्रोजेक्ट के आगे न बढ़ पाने की पूरी जिम्मेदारी 100% भारतीय पक्ष की है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा- मुंबई और अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना पर भारत और जापान के बीच बातचीत अच्छी तरह आगे बढ़ रही है। जापान की E-10 ट्रेन सीरीज अभी डेवलप की जा रही है और इसकी आपूर्ति 2030 के शुरुआती वर्षों में होगी। दोनों देशों ने फैसला किया है कि 2027 में शुरू होने वाले पहले सेक्शन पर भारतीय हाई स्पीड ट्रेन शुरू की जाएगी। भारत ने आरोप खारिज किए भारत सरकार ने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना को लेकर जापान के साथ मतभेद की खबरों को खारिज किया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि पूर्व जापानी मंत्री की टिप्पणी उनकी निजी राय है और उसका वास्तविक स्थिति से कोई मेल नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “हमने संबंधित पोस्ट देखी है। यह एक व्यक्ति की निजी राय है, जो तथ्यों से काफी अलग है।” मंत्रालय ने कहा कि मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना पर भारत और जापान के बीच बातचीत अच्छी तरह आगे बढ़ रही है और दोनों देश इस परियोजना पर मिलकर काम कर रहे हैं। 2017 में शुरू हुआ बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट देश की पहली बुलेट ट्रेन मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलेगी। दोनों शहरों के बीच 508 किमी का सफर बुलेट ट्रेन तीन घंटे में तय करेगी। अभी सफर में सात-आठ घंटे लगते हैं। प्रोजेक्ट में ₹88 हजार करोड़ जापानी निवेश मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना की अनुमानित लागत करीब ₹2 लाख करोड़ है। लगभग ₹88 हजार करोड़ जापान की सरकारी एजेंसी JICA देगी। भारत को इस पर सिर्फ 0.1% सालाना ब्याज लगेगा। इस कर्ज को चुकाने के लिए भारत को 50 साल मिलेंगे और पहले 15 साल तक किस्त नहीं देनी होगी। जापान अब तक 1,150 अरब येन (करीब ₹55 हजार करोड़) मंजूर कर चुका है। वह शिंकानसेन तकनीक, ट्रेनिंग और तकनीकी विशेषज्ञता भी भारत को दे रहा है। रूट का 7 किमी हिस्सा समुद्र के अंदर होगा ——————— ये खबर भी पढ़ें… मोदी बोले- सुजुकी दो-तिहाई कारें भारत में बना रही:जापान की मदद से देश में खाद के 1000 कारखाने लगेंगे; PM ताकाइची को बहन कहा भारत और जापान ने आर्थिक साझेदारी को नई रफ्तार देने का फैसला किया है। भारत-जापान जॉइंट इकोनोमिक फोरम में प्रधानमंत्री मोदी ने जापानी कंपनियों की दिक्कतें दूर करने के लिए ‘जापान बिजनेस वीक’ शुरू करने का ऐलान किया। इसके तहत PMO के सीनियर अधिकारी सीधे जापानी निवेशकों से बातचीत करेंगे। पूरी खबर पढ़ें…

दावा- BLA ने पाकिस्तान के 45 सैनिकों को मारा:बलूचिस्तान में बस को बम से उड़ाया, बचाव में पहुंची टुकड़ी पर भी हमला

बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने दावा किया है कि उसने मस्तंग जिले में पाकिस्तान सेना के एक काफिले पर हमला किया है। इस हमले में 45 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है, जबकि दर्जनों जवान घायल हुए हैं। यह घटना गुरुवार को क्वेटा-कराची हाइवे पर खदकुचा के पास हुई। पाकिस्तान सेना ने बस काफिले पर हमले की पुष्टि की है, लेकिन हताहत हुए जवानों की संख्या पर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है। BLA प्रवक्ता जियांद बलूच ने बयान जारी कर बताया कि इस हमले में काफिले, सुरक्षा टीम और बाद में पहुंची सेना की टुकड़ियों को निशाना बनाया गया। BLA ने इस हमले को ‘फतह स्क्वाड’ द्वारा अंजाम दिया गया एक सुनियोजित और जबरदस्त हमला बताया है। बचाव के लिए पहुंचे सैनिकों पर भी हमला BLA का दावा है कि हमले में सैनिकों को ले जा रही बसों के काफिले को निशाना बनाया गया। इसके अलावा काफिले की सुरक्षा में तैनात सैनिकों और बाद में मौके पर पहुंची अतिरिक्त सैन्य टुकड़ी पर भी हमला किया गया। संगठन के मुताबिक, इसके बाद इलाके में काफी देर तक मुठभेड़ चली। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह हाल के वर्षों में बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना पर हुए सबसे घातक हमलों में से एक माना जाएगा। सीमित रास्तों का उठाता है BLA फायदा बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा, लेकिन सबसे कम आबादी वाला प्रांत है। यहां रेगिस्तान और पहाड़ों के बीच सेना की आवाजाही के लिए गिनी-चुनी मुख्य सड़कें ही हैं। ऐसे में सैनिकों के काफिलों को बार-बार उन्हीं रास्तों से गुजरना पड़ता है। इसका फायदा उठाकर उग्रवादी पहले से उनकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं और ऐसे स्थान चुनते हैं, जहां घात लगाकर हमला करना आसान हो और सेना के लिए जवाबी कार्रवाई करना मुश्किल हो। बिना बख्तरबंद बसों में सफर बना कमजोरी BLA का आरोप है कि पाकिस्तानी सेना कई बार सक्रिय संघर्ष वाले इलाकों में भी सैनिकों को सामान्य यात्री बसों में ले जाती है। इन बसों में बारूदी सुरंगों या भारी गोलीबारी से बचाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा नहीं होती। यदि काफिले पर अचानक हमला हो जाए या सड़क किनारे लगाए गए विस्फोटक में धमाका हो जाए, तो ऐसे वाहनों में बैठे सैनिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही वजह है कि शुरुआती हमले में बड़ी संख्या में हताहत होने की आशंका बढ़ जाती है। स्थानीय खुफिया जानकारी की कमी भी बड़ी चुनौती पाकिस्तानी सेना को बलूचिस्तान में स्थानीय स्तर पर खुफिया जानकारी जुटाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कई वर्षों से चल रहे सैन्य अभियानों और स्थानीय लोगों की नाराजगी के कारण सेना को इलाके से पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाता। दूसरी ओर, उग्रवादी संगठनों को स्थानीय स्तर पर जानकारी मिलने का फायदा मिलता है। इससे उन्हें सेना की आवाजाही, गश्त और अभियान की पहले से जानकारी मिल जाती है। 44% भूभाग, 6% आबादी; कमाई केंद्र और चीन के पास जाने से गुस्सा बलूचिस्तान पाक का 44% भूभाग है। देश की आबादी में हिस्सेदारी 6% है। तांबा, सोना, कोयला, प्राकृतिक गैस व संसाधनों के यहां बड़े भंडार हैं। इसके बावजूद आरोप है कि इससे कमाई का बड़ा हिस्सा केंद्र, सेना व चीनी कंपनियों को मिलता है। बलूच राष्ट्रवादी संगठनों का आरोप है कि इन संसाधनों का लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिल रहा। उनका कहना है कि केंद्र सरकार क्षेत्र के संसाधनों का दोहन करती है, जबकि स्थानीय आबादी आज भी पीने के पानी, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं से जूझ रही है। इसी असंतोष को बलूच विद्रोह की एक बड़ी वजह माना जाता है। 2025 में हुए 254 विद्रोही हमलों में एक हजार की मौत बलूचिस्तान में विद्रोह अब छिटपुट नहीं, बल्कि सुरक्षा संकट बन गई है। पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज के मुताबिक 2025 में प्रांत में 254 हमले हुए। यह 2024 की तुलना में 26% अधिक थे। इन घटनाओं में 1,026 लोग मारे गए। ​ हालांकि, BLA ने अपनी रिपोर्ट में 2025 में 521 हमलों में 1,060 सुरक्षाकर्मियों के मारने का दावा किया है। हमलों के तरीके भी बदले हैं। विद्रोही अब पुलिस चौकियों, ट्रेनों, हाईवे व सैन्य काफिलों पर बड़े और संघटित हमले कर रहे हैं। वहीं, डर हमलों के चलते आधे से ज्यादा भूभाग पर पुलिस का नियंत्रण भी नहीं रहा है। यह खबर भी पढ़ें… BLA का दावा- हमले में 30 पाकिस्तानी जवान मारे:कैंप में विस्फोटकों से भरी गाड़ी से ब्लास्ट किया बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने दावा किया है कि उसने पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के ग्वादर जिले के जिवानी इलाके में पाकिस्तान कोस्ट गार्ड्स के कैंप पर हमला किया है। BLA के मुताबिक, 3 जुलाई की शाम करीब 6:32 बजे उसके मजीद ब्रिगेड के एक हमलावर ने विस्फोटकों से भरी गाड़ी को कैंप में घुसाकर विस्फोट कर दिया। पूरी खबर यहां पढ़ें…