जोधपुर की बावड़ियों के लिए टूरिस्ट ने छोड़ा अपना देश:पैर टूटने पर भी नहीं थमे, 10 बावड़ी साफ कर चुके; बोले-अब यहीं मरना चाहता हूं
जोधपुर शहर अपनी ‘अपणायत’ (अपनत्व) और लाजवाब खान-पान के लिए दुनिया भर में खास पहचान रखता है। यहां की ऐतिहासिक बावड़ियां सदियों से इस शहर की खूबसूरती को अपने भीतर समेटे हुए हैं। साल 2017 में आयरलैंड से सिरेमिक आर्टिस्ट केरोन जोधपुर घूमने आए थे। जब उन्होंने यहां की ऐतिहासिक बावड़ियां देखी तो उन्होंने उसी पल ठान लिया कि वे अब इस शहर को छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। 77 साल के हो चुके केरोन अब तक जोधपुर की 10 बावड़ियों की सूरत बदल चुके हैं। इस उम्र में भी उनका जज्बा कम नहीं हुआ है। वे आज भी रोज सुबह 8 बजे बावड़ियों की देखभाल और सफाई के लिए निकल पड़ते हैं। इस सफर की शुरुआत में उनके सामने कई मुश्किलें आईं। इस बीच एक हादसे में उनका पैर भी टूट गया, जिसके कारण उन्हें तीन महीने तक बिस्तर पर आराम करना पड़ा। इसके बाद भी उन्होंने जोधपुर और यहां की बावड़ियों को नहीं छोड़ा। समय के साथ केरोन की इस मुहिम से कई लोग जुड़े, लेकिन इनमें एक खास शख्स हैं- शंभु। शंभु, केरोन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। शंभु ने अपना घर तक छोड़ दिया। पढ़िए केरोन कैसे जोधपुर शहर की बावड़ियों को संवारने में लगे हैं… बावड़ियां देख प्रभावित हुए, हालत ने मायूस कर दिया केरोन ने बताया कि मैं आयरलैंड में सिरेमिक आर्टिस्ट था। मेरे पिता आर्किटेक्ट रहे हैं, ऐसे में मुझे बिल्डिंग और उनके स्ट्रक्चर से काफी लगाव है। मैं साल 2017 में राजस्थान आया और इसके बाद जोधपुर। यहां जब शहर की बावड़ियों को देखा तो काफी प्रभावित हुआ। लेकिन इन बावड़ियों की हालत देख मुझे काफी दुख हुआ। पता चला कि इनके लिए कोई गाइडलाइन नहीं है। इसके बाद मैंने इन बावड़ियों को सुधारने का जिम्मा उठाया। क्लीन बावड़ी मूवमेंट शुरू किया। अकेले 10 दिन तक सफाई करते रहे केरोन ने बताया- जोधपुर की बावड़ियों की हालत देख मैंने ठान लिया था कि अब मैं यहीं रुकूंगा। मैंने महिला बाग झालरा से सफाई की शुरुआत की। शुरुआत के 10 दिन मैं अकेले सफाई करता रहा। इसके बाद शंभु समेत बाकी लोग भी मेरे साथ जुड़े। एक महीने तक इस बावड़ी को साफ करने का काम किया। मैं अब तक नवलखा बावड़ी, नाथों की बावड़ी, गोल नाड़ी, गोरूंदा, तापी बावड़ी, गुलाब सागर, क्रिया झालरा बावड़ी, सत्यनारायण बावड़ी और फतेह सागर बावड़ी की सफाई कर चुका हूं। नवलखा बावड़ी को साफ करने में डेढ़ महीना और नाथों की बावड़ी में एक महीने का समय लगा। आज भी तापी बावड़ी की सफाई के लिए जुटा रहता हूं। इन बावड़ियों की सफाई के लिए अपनी सेविंग तक लगा चुका हूं। पैर टूटा, फिर भी अपने देश नहीं लौटे आयरिश नागरिक केरोन ने बताया- मैं एक दिन काम कर रहा था। इसी दौरान नीचे गिर गया था। मेरा पैर टूट गया। पैर में रॉड डाली गई। हादसे के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने मुझे घर (आयरलैंड) लौटने को कहा और सहायता की भी बात कही। मैंने मना कर दिया। मैं अब जोधपुर में ही रहना चाहता हूं। तीन महीने आराम करने के बाद दोबारा काम पर लौटा और जोधपुर की बावड़ियों को सुधारने में लग गया। केरोन ने बताया- अब जब लोगों को पता चला कि हमारी बावड़ियां कितनी अच्छी हैं तो कई लोग हमारे साथ इस मुहिम में जुड़े हैं। खास तौर पर मेहरानगढ़ और मेहरानगढ़ फोर्ट ट्रस्ट मदद के लिए आगे आया और मेरे काम को सराहा। मैं अंतिम सांस यहीं लेना चाहता हूं केरोन ने बताया- मेरी एक बेटी डॉक्टर और बेटा ड्राइवर है। जब उनसे पूछा गया कि क्या दोबारा अपने परिवार के पास लौटना चाहते हैं तो उन्होंने कहा- मैंने अपनी जिंदगी यहां की बावड़ियों को दे दी। परिवार के लोग से वीडियो कॉल हो जाती है। आखिरी बार बेटी से 4 महीने पहले बात हुई थी। उन्होंने बताया- शायद मेरे इस काम की वजह से परिवार मुझे पसंद नहीं करता। मैं अपनी अंतिम सांस भी यहीं लेना चाहता हूं। इस काम में शंभु ने मेरा काफी साथ दिया। बावड़ियों के पानी को पीने लायक बनाना है केरोन ने बताया- अब मैं स्टेप वेल स्पोर्ट एंड हाइजीन प्रोग्राम चला रहा हूं। इस मुहिम में मेहरानगढ़ और मेहरानगढ़ फोर्ट ट्रस्ट भी काफी मदद कर रहा है। इस प्रोग्राम का उद्देश्य है कि वे इसे बिल्कुल साफ रखें और इसके पानी को पीने लायक बनाएं। इतना ही नहीं, यहां एक चौकीदार और क्लीनर रखेंगे, जो इसकी देखभाल और साफ-सफाई करेंगे। मैं जोधपुर शहर को कुछ लौटाना चाहता हूं, इसलिए अब मुझे ये शहर पसंद आने लगा है। मैं गोल नाड़ी के पास एक पेइंग गेस्ट हाउस में रहता हूं। यहां के गौरीशंकर मेहरा ने मुझे परिवार की तरह गोद लिया है। केरोन के लिए छोड़ दिया घर शंभु ने बताया- केरोन के लिए मैंने अपना घर छोड़ दिया। गुलाब सागर की पाल पर ही एक झोपड़ी बना ली। केरोन और शंभु का याराना ऐसा हो गया है कि गुलाब सागर पर अगर आप केरोन के बारे में पूछेंगे तो एक ही जवाब मिलेगा- शंभु को पता है, वो कहां मिलेंगे और कब अपने काम पर निकलेंगे।

