यदि आप उदयपुर संभाग के उन ढाई लाख ईएसआईसी कार्डधारक बीमित कर्मचारियों में से हैं, जो हर महीने अपनी गाढ़ी कमाई से 15 करोड़ रुपए (सालाना 180 करोड़ रुपए) सरकारी खजाने में जमा कराते हैं। आपकी ही बदौलत उदयपुर में 100 करोड़ रुपए की लागत से एक आलीशान इमारत बनकर खड़ी हो चुकी है। कागजों में इसे मॉडल हॉस्पिटल और सुपरस्पेशलिटी सेंटर कहा जाता है, लेकिन हकीकत में यह सिर्फ एक भव्य रेफरल सेंटर बनकर रह गया है। इलाज को छोड़कर बाकी सब कुछ प्रथम श्रेणी का है। यहां 64 की जगह 75 नर्सेज (जरूरत से ज्यादा) मुस्तैद हैं, लेकिन गंभीर बीमारी का इलाज करने वाले डॉक्टर नहीं हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों के स्वीकृत 34 पदों में से केवल 4 डॉक्टर ही कार्यरत हैं। इनमें भी सिर्फ आंख (ओप्थाल्मोलॉजी), स्किन (डर्मेटोलॉजी), शिशु रोग (पिडियाट्रिक) और रेडियोलॉजी के डॉक्टर ही ड्यूटी बजा रहे हैं। गंभीर रोगों के इलाज के लिए आवश्यक सुपरस्पेशलिटी विभागों नेफ्रोलॉजी, कार्डियोलॉजी, आंकोलॉजी (कैंसर), न्यूरोलॉजी, यूरोलॉजी और एंडोक्राइनोलॉजी का तो खाता तक नहीं खुला है। यहां एक भी डॉक्टर नहीं हैं। पैरामेडिकल स्टाफ में 77 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 25 हैं। रेजिडेंट डॉक्टर्स 38 में से केवल 1 रेजिडेंट कार्यरत हैं। गत वर्ष आए तीन सीनियर रेजिडेंट्स तो दो-दो महीने काम करके ही यहां से निकल गए। मुख्यालय या तो अस्पताल की क्षमता 100 बेड से बढ़ाकर 150 या 200 बेड करे, ताकि यहां आने वाले डॉक्टरों का अनुभव काउंट हो सके और वे टिक पाएं। या फिर मुख्यालय स्तर से ही स्थायी विशेषज्ञों की सीधी पदस्थापना की जाए, ताकि ढाई लाख बीमित श्रमिकों को उनके हक का इलाज उदयपुर में ही मिल सके। अनोखा आदेश… इलाज मत करो, मरीज को बाहर भेजो जब स्थानीय बीमित श्रमिकों ने डॉक्टर भेजने की गुहार लगाई तो दिल्ली-जयपुर बैठे आकाओं ने डॉक्टर भेजने के बजाय एक और अनोखा आदेश जारी कर दिया। इसमें कहा गया है कि स्थानीय आरएनटी (आरएनटी) मेडिकल कॉलेज से टाइअप कर काम चलाओ, या फिर मरीज को उठाकर जयपुर, कोटा, अहमदाबाद, अलवर या बीकानेर के ईएसआईसी अस्पतालों में रेफर कर दो। यह स्थिति तब है जब उदयपुर का श्रमिक अपनी जेब से सालाना 180 करोड़ रुपए प्रीमियम भर रहा है और जब इलाज की नौबत आए तो 300 से 500 किलोमीटर दूर दूसरे शहरों की दौड़ लगाएं। आंकड़ों में हकीकत : इस साल 1200 मरीजों को कर चुके रेफर अस्पताल के निर्माण पर 100 करोड़ रु. खर्च हुए हैं। ईएसआईसी का मासिक प्रीमियम कलेक्शन 15 करोड़ रु. है, जो सालाना 180 करोड़ तक पहुंचता है। उदयपुर जिले में 92 हजार और संभाग में 2.50 लाख कार्मिक ईएसआईसी के दायरे में हैं। गत वर्ष 90 हजार ओपीडी व 21 हजार आईपीडी मरीज आए थे। इस वर्ष जनवरी से जुलाई तक 44,100 ओपीडी और 17 हजार आईपीडी मरीज दर्ज हुए हैं। गत वर्ष 3,800 मरीजों को बाहर रेफर किया था। इस वर्ष जनवरी से जुलाई तक 1,200 रेफर किए जा चुके हैं। इनमें अधिकांश एमआरआई, सीटी स्कैन, हृदय रोग और न्यूरो से जुड़ी समस्याओं के मरीज हैं। 100 बेड की सीमा: डॉक्टर लंबे समय तक टिकना नहीं चाहते 100 बेड का अस्पताल होने से यहां कार्यरत डॉक्टरों का अनुभव आगे की पढ़ाई या उच्च पदों के लिए मान्य नहीं माना जाता। यही डॉक्टरों के यहां नहीं टिकने का मुख्य कारण है। कॅरिअर प्रभावित होने की आशंका के चलते डॉक्टर यहां लंबे समय तक काम नहीं करना चाहते। 18 मई को इंटरव्यू के जरिए गायनिक और सर्जरी के दो डॉक्टर नियुक्त किए गए थे, लेकिन इनमें से सर्जरी के डॉक्टर ही टिके। बता दें कि अशोक नगर, बेदला रोड, फतेहपुरा और मादड़ी रोड नंबर-3 के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े 1 लाख बीमितों को बेहतर इलाज देने के उद्देश्य से अस्पताल शुरू किया गया था, लेकिन अब मेडिकल क्लेम महीनों अटक रहे हैं। हम मुख्यालय से मिलने वाले निर्देशों के अनुसार ही कार्य कर रहे हैं। जो भी कमियां हैं, उन्हें दूर करने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। डॉक्टरों की कमी पूरी करने के लिए समय-समय पर वॉक-इन इंटरव्यू लिए जाते हैं। जो विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं, ऐसे मरीजों को सही समय पर उपचार दिलाने के लिए रेफर करना नियम अनुसार अनिवार्य है।
-डॉ. अनुराधा गहलोत, अधीक्षक, ईएसआईसी हॉस्पिटल उदयपुर