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आज 13 जिलों में बारिश की संभावना:मानसून ब्रेक लंबा हुआ, फसलें सूखने लगीं; 19 जुलाई से फिर बदलेगा मौसम

राजस्थान में गुरुवार को भारी बारिश की कोई चेतावनी (अलर्ट) जारी नहीं की गई है, लेकिन प्रदेश के 13 जिलों में हल्की बारिश की संभावना है। मौसम विभाग के अनुसार, जयपुर, भरतपुर और बीकानेर संभागों में कहीं-कहीं हल्की बौछारें पड़ सकती हैं। पिछले 24 घंटे में सबसे ज्यादा बारिश अलवर, कोटपूतली-बहरोड़ में आधा इंच तक रिकॉर्ड हुई। बुधवार शाम को श्रीगंगानगर में भी हल्की बारिश हुई। राज्य का सबसे अधिक तापमान भी श्रीगंगानगर में 40 डिग्री के ऊपर रिकॉर्ड हुआ। मानसून ब्रेक लंबा होने के कारण खरीफ की फसलें सूखने लगी हैं। राज्य में अब तक 13 फीसदी कम बारिश हुई है। मौसम विभाग के अनुसार 19 जुलाई से फिर मानसून एक्टिव होने की संभावना है। सबसे पहले देखिए- राजस्थान में बारिश-बादल की स्थिति गर्मी-बारिश के बड़े अपडेट्स राजस्थान के ऊपर से बादल गायब: भारतीय मौसम विभाग की सैटेलाइट इमेज में राजस्थान के ऊपर से बादल नहीं है। करीब 10 जुलाई से डेली इसी तरह की स्थिति है। बारिश कम होने का असर खरीफ (मोटा अनाज और दालें) की फसलों पर नजर आने लगा है। कम बारिश के कारण ये सूखने लगी हैं और खराबे की आशंका बढ़ गई है। गर्मी और उमस का असर: पिछले 24 घंटों के दौरान राजस्थान में गर्मी और उमस का मिलाजुला असर देखने को मिला, जहां श्रीगंगानगर 40.1 डिग्री सेल्सियस के साथ राज्य का सबसे गर्म शहर रहा। इसके बाद जैसलमेर में 39.0 डिग्री सेल्सियस और बीकानेर में 38.8 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया। 19 जुलाई से बदल सकता है मौसम: मौसम विभाग के अनुसार 19 जुलाई से एक नया पश्चिमी विक्षोभ भी उत्तर-पश्चिम भारत में दस्तक देने जा रहा है, जिससे आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियों में फिर से तेजी आ सकती है। फिलहाल राज्य में भारी बारिश का अलर्ट नहीं है। आज हल्की बरसात की संभावना: मौसम विभाग ने 16 जुलाई को श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, झुंझुनूं, सीकर, कोटपूतली-बहरोड़, खैरथल-तिजारा, अलवर, डीग, भरतपुर, धौलपुर, करौली और दौसा जिलों में हल्की बारिश की संभावना जताई है। राजस्थान के मौसम के PHOTO ये शहर सबसे ज्यादा गर्म राजस्थान के बड़े शहरों में कैसा रहा मौसम जयपुर: जिले में बुधवार को मौसम साफ रहा, हालांकि जिले में कहीं-कहीं हल्के बादल भी छाए रहे। अधिकतम तापमान 35.0 डिग्री और न्यूनतम 28.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।आने वाले दिनों में जिले के तापमान में और भी बढ़ोतरी होने की आशंका है। उदयपुर: जिले में बुधवार को मौसम गर्म रहा। दिनभर खिली तेज धूप के कारण लोगों को भीषण गर्मी और उमस का सामना करना पड़ा। अधिकतम तापमान 34.0 डिग्री और न्यूनतम तापमान 26.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। बीते एक दिन में दिन के तापमान में 1.2 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान में 0.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। अलवर: जिले में सुबह के समय घने बादल छाए। दोपहर बाद तेज धूप निकलने से उमस व गर्मी रही। अधिकतम तापमान करीब 36.0 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। मौसम विभाग के अनुसार, अगले पांच दिनों तक जिले में बादलों की आवाजाही बनी रहेगी और कई स्थानों पर हल्की बारिश या बूंदाबांदी हो सकती है। अजमेर: जिले में बुधवार को मौसम सामान्य लेकिन उमस भरा रहा। अधिकतम तापमान 34.7 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 25.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। तापमान सामान्य रहने के बावजूद दिनभर उमस का असर बना रहा। शाम को हवा के कारण गर्मी-उमस से थोड़ी राहत मिली। सीकर: जिले में बुधवार सुबह से ही हल्के बादलों की आवाजाही के साथ ठंडी हवा चली। जिससे लोगों को उमस से थोड़ी राहत मिली, हालांकि दिन चढ़ने के साथ ही धूप की तेजी बढ़ गई। मौसम विभाग के अनुसार सीकर के उत्तर-पूर्वी इलाकों में देर रात तक हल्की बारिश होने का अनुमान है। जिले में 15 जुलाई तक औसत से 45 प्रतिशत से भी कम बारिश दर्ज की गई है। कोटा: जिले में बुधवार को गर्मी और उमस का असर बना रहा। जिले में मानसून की अच्छी बारिश का इंतजार अभी भी बरकरार है। बुधवार को यहां का अधिकतम तापमान 37.4 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 28.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। बारिश नहीं होने के कारण बढ़ी उमस ने लोगों को दिनभर परेशान किया।

जयपुर के बाद 3 और शहरों में शुरू होगी 'भारत-टैक्सी':बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के चुनाव में ड्राइवर्स भी डाल सकेंगे वोट, जोधपुर में रजिस्ट्रेशन शुरू

जयपुर के बाद अब जल्द ही जोधपुर, कोटा और उदयपुर में भी ‘भारत टैक्सी’ की शुरुआत होने जा रही है। जोधपुर शहर के लिए मैपिंग का काम लगभग पूरा हो चुका है। दावा किया जा रहा है कि अगस्त महीने के अंत तक जोधपुरवासियों को इसकी सेवाएं मिलनी शुरू हो जाएंगी। इसके अलावा, कोटा और उदयपुर में भी इसी महीने के अंत तक मैपिंग का काम पूरा कर लिया जाएगा। जोधपुर में ड्राइवर्स के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू हो चुका है, जबकि कोटा और उदयपुर में अगले महीने से रजिस्ट्रेशन शुरू होने की संभावना है। जयपुर में इसी महीने ‘भारत टैक्सी’ की ऑफिशियल लॉन्चिंग होने जा रही है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा जयपुर में इसकी शुरुआत करेंगे। इसके बाद जल्द ही जोधपुर, उदयपुर और कोटा में भी इस सेवा को पूरी तरह शुरू कर दिया जाएगा। ‘भारत टैक्सी’ के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के चुनावों में ड्राइवर (सारथी) भी वोट डाल सकेंगे। इसके लिए ड्राइवर्स को कंपनी के 5 शेयर खरीदने होंगे। एक शेयर की कीमत 100 रुपए है। यानी 500 रुपए के शेयर खरीदने पर उन्हें मेंबरशिप भी मिलेगी। जोधपुर के कैब ड्राइवर्स के लिए शुरू हुआ रजिस्ट्रेशन भारत टैक्सी के स्टेट हेड अभिषेक चारण ने बताया कि जोधपुर शहर की मैपिंग शुरू हो चुकी है। वैसे, अगस्त से ड्राइवर्स का फिजिकल रजिस्ट्रेशन भी शुरू होगा। लेकिन, यदि कोई कैब ड्राइवर इसके लिए पहले ही रजिस्ट्रेशन करवाना चाहता है, तो उसे प्ले स्टोर से ‘भारत टैक्सी ड्राइवर’ एप इंस्टॉल करना पड़ेगा। इसके बाद एप पर अलग-अलग व्हीकल डिटेल्स (गाड़ियों की जानकारी) के विकल्प आएंगे। इसमें ड्राइवर्स को अपनी गाड़ी की डिटेल्स और जरूरी डॉक्यूमेंट्स अपलोड करने होंगे, जिसके बाद उनका रजिस्ट्रेशन हो जाएगा। शहर में मैपिंग का काम पूरा, 3 हजार कैब ड्राइवर्स को जोड़ा जाएगा अभिषेक चारण ने बताया कि जोधपुर के शहरी इलाके में भारत टैक्सी की सुविधा पूरी तरह उपलब्ध होगी। इसके लिए मैपिंग का काम पूरा हो चुका है। शहरवासी जोधपुर के बनाड़, मंडोर, पाली रोड और बोरानाडा तक के लिए भी कैब बुक कर सकेंगे। शुरुआती दौर में करीब 3 हजार कैब ड्राइवर्स को जोड़ा जाएगा। इसमें कार और ऑटो ड्राइवर दोनों शामिल हैं। इसके साथ ही बाइक राइडर्स भी इसमें अपना रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं। जोधपुर की तरह ही उदयपुर और कोटा में भी लगभग 3-3 हजार ड्राइवर्स को ‘भारत टैक्सी’ से जोड़ने की तैयारी है। हालांकि, शहरों में कैब और अन्य गाड़ियों की उपलब्धता के आधार पर ड्राइवर्स की यह संख्या थोड़ी कम या ज्यादा भी हो सकती है। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के चुनावों में 2 सीटें रहेंगी रिजर्व खास बात यह है कि यह पूरा प्रोजेक्ट सहकारी मॉडल पर आधारित है। यानी पांच साल में जब भी चुनाव होंगे, इसमें कैब ड्राइवर को भी वोट डालने का अधिकार मिलेगा। लेकिन, इसके लिए उन्हें कंपनी के पांच शेयर खरीदने होंगे। एक शेयर की कीमत 100 रुपए है। यानी 500 रुपए के शेयर खरीदने पर उन्हें मेंबरशिप भी मिलेगी। इसका फायदा यह होगा कि जब भी चुनाव होंगे, वे अपने पसंदीदा मेंबर को वोट डाल सकेंगे। दूसरा फायदा यह होगा कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के पांच पदों में से 2 पद ‘सारथी’ यानी कैब ड्राइवर के लिए रिजर्व रहेंगे, जिससे वे उस पद के लिए चुनाव लड़ सकेंगे। इसके अलावा वे कंपनी के शेयरहोल्डर बन जाएंगे और भविष्य में कंपनी को होने वाले मुनाफे में उनका भी हक रहेगा। जोधपुर के बाद कोटा और उदयपुर में होगी शुरुआत, किराया तय नहीं जोधपुर में रजिस्ट्रेशन की शुरुआत के बाद अब कोटा और उदयपुर में मैपिंग की तैयारी की जा रही है। बताया जा रहा है कि जयपुर में इसकी ऑफिशियल शुरुआत होने के बाद बाकी दोनों शहरों में मैपिंग हो जाएगी और इसके साथ ही ड्राइवरों के लिए रजिस्ट्रेशन भी शुरू हो जाएगा। इधर, जोधपुर समेत बाकी शहरों में कितना किराया होगा, यह अभी तय नहीं है। लेकिन, कंपनी का दावा है कि वर्तमान में चलने वाली अन्य कैब कंपनियों के मुकाबले काफी रियायती (किफायती) दरों पर शहरवासियों को इसकी सुविधा मिलेगी। हर राइड की पूरी कमाई ड्राइवर को हर राइड की 100% कमाई ड्राइवर को मिलेगी। उसे सिर्फ दैनिक, साप्ताहिक या मासिक शुल्क देना होगा, जो कि बहुत ही सामान्य रहेगा। इसके तहत महिला ड्राइवर्स को भी जोड़ा जाएगा। हालांकि जोधपुर में इनकी संख्या कितनी होगी, ये जल्द तय होगा।
—- यह खबर भी पढ़िए…. जयपुर में 11KM का किराया ओला-उबर से 25 रुपए कम:भारत टैक्सी का कस्टमर एप शहर में लॉन्च; बटन दबाते ही पुलिस तक पहुंचेगी सूचना जयपुर में भारत टैक्सी ने अपना कस्टमर मोबाइल एप गुरुवार को लॉन्च किया। कैब में 11 किलोमीटर तक की दूरी पर ग्राहक को करीब 25 रुपए तक का फायदा होगा। कंपनी का दावा है कि यह देश का सबसे बड़ा सहकारी मोबिलिटी प्लेटफॉर्म है, जो ड्राइवरों को सर्विस प्रोवाइडर के साथ प्लेटफॉर्म का भागीदार बनाएगा। लॉन्च के दौरान भारत टैक्सी के सीईओ कर्नल हिमांशु ने कहा-ड्राइवरों से कंपनी कमीशन नहीं लेगी। पढ़ें पूरी खबर

कई दिनों बाद राजा दरबार पहुंचे तो क्या हुआ?:राज-पाट क्यों छोड़ दिया? 'बणी-ठणी' की अनसुनी कहानी का अंतिम अध्याय; पार्ट- 4

राजस्थानी प्रेम कहानी के पार्ट-3 में आपने पढ़ा कि किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह ने दरबारी कलाकार से बणी-ठणी की पेंटिंग बनवाई, जो प्यार और सुंदरता का अद्भुत संगम था। पार्ट-4 में पढ़िए आगे की कहानी… अब राजा सावंत सिंह का अधिकांश समय संगीत और भक्ति के आनंद में बीतने लगा था। जिसके चलते वे राजकाज, दरबार और रियासत को कम समय देने लगे। इसको लेकर दरबार में चिंता गहराने लगी। मंत्री बेचैन थे, क्योंकि राजा अब एक शासक कम, भक्त अधिक हो गए थे। कई दिनों बाद राजा जब दरबार पहुंचे तो वहां जैसे असुरक्षा का भाव था। महाराज आपका अधिकतर समय काव्य, रचना और भक्ति संगीत में व्यतीत होता है। क्या कला के लिए राजकाज और राज्य की सुरक्षा को दांव पर लगाना उचित है, महाराज? वरिष्ठ मंत्री ने चिंता जताई। सभी मंत्रियों ने इसपर सहमति दिखाई। मंत्री के इस प्रश्न पर सावंत सिंह गहरी सोच में पड़ गए, और उस दिन मौन रहते हुए सिंहासन से उठकर चले गए। दरबार की चिंता धीरे-धीरे महल के गलियारों से होकर आम जनता के बीच पहुंचने लगी। राजा ये सब देख और समझ रहे थे। हमेशा की तरह उस दिन दरबार फिर शुरू हुआ। माहौल में निराशा और गहन शांति थी। राजा ने साधारण कपड़ों में दरबार में प्रवेश किया। आप सबकी चिंता उचित है। लेकिन मेरे लिए कृष्ण प्रेम और भक्ति का मार्ग ही सबसे प्रिय रहा है। प्रजा के हित को ध्यान में रखते हुए मैं सिंहासन का त्याग कर वृन्दावन के लिए प्रस्थान करने का निर्णय लेता हूं, सावंत सिंह ने भरे दरबार में सिंहासन त्यागने की घोषणा कर दी। राजा के इस फैसले से सभी उदास थे, लेकिन कुछ कर नहीं सकते थे। सिवाय इसके कि अपने राजा को अंतिम विदाई दें। समय बीता और ‘बणी-ठणी’ का मन भी दरबार से ऊब गया। अंततः उन्होंने भी अपना बाकी जीवन वृंदावन की पवित्र भूमि पर गुजारने का फैसला लिया। कहा जाता है कि राजा सावंत सिंह और ‘बणी-ठणी’ ने वृन्दावन की साधारण कुटिया में रहते हुए अपना शेष जीवन प्रभु की भक्ति, भजन और काव्य रचना को समर्पित कर दिया। और इस तरह राजा सावंत सिंह और बणी- ठणी की कहानी निहाल चंद के चित्रों में ‘राधा-कृष्ण’ के रूप में हमेशा के लिए कैद हो गई। आज भी किशनगढ़ की झील, महल और दीवारों में दबी यह कहानी किशनगढ़ शैली के चित्रों में से झांकती प्रतीत होती है। नागरीदास और रसिकबिहारी की लिखी रचनाओं की गूंज आज भी वृन्दावन की गलियों में सुनी जा सकती है। (कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। फोटो व पेंटिंग आभार : किशनगढ़ पूर्व राजपरिवार, चित्रकार, शहज़ाद अली शेरानी ) ग्राफिक्स – भाविक जैन
इनपुट सहयोग- रोहित पारीक
…… ये भी पढ़िए… 1. प्रेम कहानी जिसे शब्दों ने लिखा, रंगों ने जिंदा रखा:’बणी-ठणी’ क्या सिर्फ एक कल्पना है या वाकई कोई महिला थी? पार्ट- 1 बणी- ठणी कौन थी? ऐसा क्या था उस तस्वीर में जो राजस्थान की धरोहर बनी, जिसने किशनगढ़ शैली को दुनिया भर के कला जगत में पहचान दिलाई। जानते हैं राजा सावंत सिंह और बणी- ठणी की कहानी, जिनके प्रेम और भक्ति को कलाकार निहाल चंद ने अमर कर दिया। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए 2. खुद को कृष्ण मानते थे राजा, ‘बणी-ठणी’ को राधा:विदेशियों ने माना था भारत की मोनालिसा, ऐसा प्रेम जिसने किशनगढ़ को वृंदावन बना दिया; पार्ट–2 राजा सावंत सिंह के जीवन को भक्ति और कविता पूर्णता प्रदान करते थे, लेकिन उस दिन बणी-ठणी को सुनने के बाद उनकी साधना में अध्यात्म का एक नया और गहरा आयाम जुड़ गया था। धीरे- धीरे राजा और बणी- ठणी का रिश्ता जैसे राधा और कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम का रूपक बन गया था। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए 3- राजा ने किस महिला की बनवाई रहस्यमयी पेंटिंग:पहचान पर आज भी बहस; प्यार और सुंदरता का अद्भुत संगम, पार्ट-3 राजा सावंत सिंह और बणी-ठणी की कहानी में दोनों के श्रीकृष्ण और अध्यात्म की ओर झुकाव की विशेष भूमिका थी, जिसके चलते राजा ने बणी-ठणी में राधा की छवि को देखा था। एक शाम राजा सावंत सिंह ने निहाल चंद को बुलाया और बोले – मुझे खास चित्र बनाना है निहाल चंद। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए

भास्कर अपडेट्स:नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से आज पहली इंटरनेशनल फ्लाइट, अबू धाबी जाएगी

करूर में कचरा डंप यार्ड में भीषण आग, फायर ब्रिगेड के 20 कर्मचारी तैनात करूर नगर निगम के कचरा डंप यार्ड में भीषण आग लग गई है। यह आग कचरे के पहाड़ जैसे ढेर में तेजी से फैली, जिससे पूरा इलाका घने धुएं से घिर गया। करूर नगर निगम के सभी 48 वार्डों से इकट्ठा किया जाने वाला ठोस कचरा नियमित रूप से सरकारी फुटवियर यूनिट के पास स्थित नगर निगम के कचरा यार्ड में डाला जाता है। बताया जा रहा है कि कल रात करीब 8 बजे अचानक आग लग गई। यह आग पांच घंटे से अधिक समय से भीषण रूप से जल रही है। कचरे के विशाल ढेरों में फैली इस आग के कारण आसपास के पूरे इलाके में तीव्र गर्मी और घना धुआँ फैल गया है। करूर अग्निशमन और बचाव सेवा के 20 से अधिक कर्मी तीन दमकल गाड़ियों की मदद से आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं। कैबिनेट के 7 बड़े फैसले, सेमीकॉन 2.0 को ₹1.27 लाख करोड़; मोबाइल PLI, 9 यूरिया प्लांट समेत कई मंजूरी कैबिनेट ने बुधवार को सेमीकॉन 2.0 कार्यक्रम के लिए 1.27 लाख करोड़ रुपए की मंजूरी दी। इस योजना का मकसद भारत में सेमीकंडक्टर की पूरी सप्लाई चेन तैयार करना है। इसके तहत मिसाइल, ड्रोन, टैंक, युद्धपोत, मोबाइल, कंप्यूटर, कैमरा और एक्स-रे मशीनों में इस्तेमाल होने वाली चिप देश में ही बनाई जाएगी। साथ ही चिप निर्माण में लगने वाली मशीनें, केमिकल और 50 से ज्यादा गैसों का भी घरेलू स्तर पर उत्पादन किया जाएगा। कैबिनेट ने 62,500 करोड़ रुपए की नई मोबाइल PLI योजना को भी मंजूरी दी है। यह योजना 2030-31 तक लागू रहेगी। इसके अलावा राष्ट्रीय निवेश नीति-2026 के तहत 9 नए गैस आधारित यूरिया प्लांट लगाए जाएंगे, जिससे सालाना 1 करोड़ टन अतिरिक्त उत्पादन क्षमता बढ़ेगी। वाराणसी में 10,998 करोड़ रुपए की लागत से 43.2 किमी लंबा वरुणा कॉरिडोर और 14,447 करोड़ रुपए की लागत से 46 किमी लंबा 6-लेन गंगा कॉरिडोर बनाया जाएगा। इन दोनों परियोजनाओं से शहर में यात्रा का समय काफी कम होगा और एयरपोर्ट, बीएचयू तथा काशी विश्वनाथ मंदिर तक पहुंच आसान होगी। ओडिशा के पारादीप-हरिदासपुर रेलखंड का दोहरीकरण और झारखंड-ओडिशा के राजखरसावां-डांगोआपोसी रेलखंड पर चौथी लाइन बनाई जाएगी। इन दोनों परियोजनाओं पर कुल 3,907 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। सूरत: बाढ़ से 4 हजार कारें खराब ; ₹15 लाख की कार का मरम्मत खर्च 8 लाख सूरत में 7 जुलाई को आई बाढ़ ने सिर्फ घर-दुकान ही नहीं, बल्कि हजारों वाहनों को भी ठप कर दिया है। आरटीओ और सर्विस सेंटर के आंकड़ों के अनुसार शहर और आसपास के इलाकों में 4 हजार से अधिक कारें और एक लाख दोपहिया वाहन पानी में डूबने से प्रभावित हुए हैं। कई वाहनों के सेंसर चिप, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम फेल हुए हैं। कुछ तो अब बन भी नहीं पाएंगे। मनुभाई नामक व्यक्ति को उनकी 15 लाख कीमत की एसयूवी में इलेक्ट्रिक सेंसर और पैनल फेल होने से 8 लाख मरम्मत खर्च बताया गया है। लगभग सभी वर्कशॉप में वाहनों की लंबी कतारें लगी हैं। एक वर्कशाप के कर्मचारी ने बताया कि उसके यहां 5 दिन से 865 चारपहिया वाहनों की मरम्मत लंबित है। पहले जहां रोज 20 वाहन मरम्मत के लिए आते थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 45 से 50 वाहन हो गई है। 25 लाख की कार की मरम्मत में 15 लाख रुपए तक का खर्च आ रहा है।

भारत-चीन व्यापार- नेपाल को मंजूरी, भारतीय इंतजार में:गुंजी में 3 हजार क्विंटल गुड़-मिश्री पर सीलन का खतरा; व्यापारी धारचूला लौटे

नेपाल के व्यापारियों को तिब्बत की पुरंग मंडी में कारोबार की अनुमति मिल गई है, लेकिन भारतीय व्यापारी अब भी चीन की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। लिपुलेख दर्रे से भारत-तिब्बत व्यापार शुरू नहीं होने से गुंजी में रखा करीब 3 हजार क्विंटल गुड़ और मिश्री लगातार बारिश और सीलन के कारण खराब होने की कगार पर पहुंच गया है। कोरोना काल के बाद इस साल भारत-तिब्बत व्यापार दोबारा शुरू होने की उम्मीद जगी थी। तकलाकोट व्यापार के लिए 134 भारतीय व्यापारियों ने आवेदन किया है। प्रशासन अब तक 100 व्यापारियों और उनके सहायकों को ट्रेड पास जारी कर चुका है। व्यापारियों को 8 जुलाई को तकलाकोट (पुरंग) रवाना होना था, लेकिन चीन की अंतिम मंजूरी नहीं मिलने से पूरा कार्यक्रम रुक गया। इस बीच 11 जलाई को 28 से अधिक व्यापारी सामान गुंजी में छोड़कर धारचूला लौट आए। व्यापारियों का कहना है कि गुंजी में खाने-पीने और अन्य जरूरी संसाधनों की कमी है। जब तक चीन की ओर से आगे बढ़ने का आदेश नहीं मिलता, वहां रुकने का कोई मतलब नहीं है। अनुमति मिलते ही वे दोबारा गुंजी पहुंचेंगे। अब जानिए क्या है स्थिति… 1. चीन बोला- अभी सुविधाएं पूरी नहीं
चीनी अधिकारियों का कहना है कि पुरंग (तकलाकोट) मंडी में भारतीय व्यापारियों के लिए पर्याप्त दुकानें और अन्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। व्यवस्थाएं पूरी होने के बाद ही व्यापार शुरू किया जाएगा। 2. 3 हजार क्विंटल गुड़-मिश्री पर खतरा
गुंजी में रखा करीब 3 हजार क्विंटल गुड़ और मिश्री लगातार बारिश और सीलन से खराब होने की आशंका में है। अनुमति में देरी से व्यापारियों का नुकसान बढ़ने लगा है। 3. नेपाल को अनुमति, भारतीयों का इंतजार
भारत-चीन व्यापार समिति के अध्यक्ष जीवन सिंह रौंकली का कहना है कि चीन ने नेपाल के व्यापारियों को पुरंग मंडी में कारोबार की अनुमति दे दी है, जबकि भारतीय व्यापारियों को अब तक प्रवेश नहीं मिला। उन्होंने इसे भारतीय व्यापारियों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया बताया। 4. प्रशासन बोला- चीन से संपर्क जारी
एसडीएम आशीष जोशी ने बताया कि भारतीय व्यापारियों को बिना सामान के तिब्बत जाकर वहां की व्यवस्थाएं देखने की अनुमति देने का अनुरोध किया गया है। चीन की ओर से जवाब का इंतजार है। 2019 के बाद से बंद है सीमा व्यापार लिपुलेख दर्रे से भारत और तिब्बत के बीच सदियों से पारंपरिक व्यापार होता रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद व्यापार बंद हो गया था। बाद में 1992 में तकलाकोट (पुरंग) मंडी के जरिए व्यापार फिर शुरू हुआ। कोरोना महामारी के दौरान 2019 के बाद यह व्यापार फिर बंद हो गया। छह साल बाद व्यापार शुरू होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन चीन की मंजूरी अटकने से अनिश्चितता बढ़ गई है। सामान्य पासपोर्ट से इतना अलग ट्रेड पास… 1. विदेश यात्रा का नहीं, सीमा व्यापार का दस्तावेज सामान्य पासपोर्ट भारत सरकार का आधिकारिक यात्रा दस्तावेज है, जिसके जरिए व्यक्ति वीजा नियमों के तहत दुनिया के विभिन्न देशों की यात्रा कर सकता है। इसके विपरीत भारत-तिब्बत ट्रेड पास केवल सीमा व्यापार से जुड़े अधिकृत लोगों को जारी किया जाता है। यह पर्यटन, नौकरी या अन्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए मान्य नहीं होता। 2. तय मार्ग और सीमित अवधि के लिए मान्य सामान्य पासपोर्ट कई वर्षों तक वैध रहता है और धारक को विभिन्न देशों की यात्रा की अनुमति देता है। वहीं ट्रेड पास केवल निर्धारित ट्रेड सीजन और अधिकृत व्यापारिक मार्ग, जैसे लिपुलेख दर्रा-तकलाकोट क्षेत्र के लिए ही जारी किया जाता है। इसकी वैधता सीमित होती है और अवधि समाप्त होने पर इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। 3. विशेष अनुमति-पत्र, जिसमें भूमिका भी तय होती है ट्रेड पास सामान्य पहचान दस्तावेज नहीं, बल्कि सीमा व्यापार के लिए जारी विशेष अनुमति-पत्र है। यह केवल पंजीकृत व्यापारियों, उनके सहायकों, पोर्टर, कुली और म्यूल (खच्चर) चालकों को दिया जाता है। पास में धारक की श्रेणी भी दर्ज होती है। इसे किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता और ट्रेड सीजन समाप्त होने पर संबंधित प्राधिकरण को वापस जमा करना पड़ता है। पात्रता से मंजूरी तक पूरी प्रक्रिया भारत-तिब्बत ट्रेड पास सामान्य पर्यटकों के लिए नहीं, बल्कि सीमा व्यापार से जुड़े पंजीकृत व्यापारियों, उनके सहायकों, पोर्टर, कुली और म्यूल (खच्चर) चालकों को जारी किया जाता है। पास बनवाने के लिए आवेदक का नाम सीमा व्यापार या पंजीकृत व्यापारी सूची में होना जरूरी है। इसके बाद आवेदन ट्रेड कार्यालय या जिला प्रशासन के पास जमा किया जाता है। आवेदन मिलने पर एसआईबी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ब्रांच) समेत अन्य सुरक्षा और प्रशासनिक जांच होती है। सभी मंजूरियां मिलने के बाद ट्रेड पास जारी किया जाता है। इसके लिए पहचान पत्र, स्थानीय निवासी या व्यापारी प्रमाण, व्यापार पंजीकरण दस्तावेज, फोटो और सुरक्षा क्लीयरेंस से जुड़े रिकॉर्ड की जरूरत पड़ सकती है। अंतिम दस्तावेजों की सूची संबंधित जिला प्रशासन की अधिसूचना के अनुसार तय होती है। अब सड़क के सहारे तकलाकोट तक आसान पहुंच अब तक लिपुलेख दर्रे से होने वाला कारोबार पूरी तरह पारंपरिक ढुलाई व्यवस्था पर निर्भर था। व्यापारी धारचूला से गुंजी, कालापानी और नाभीढांग होते हुए कई दिन की कठिन यात्रा कर दर्रे तक पहुंचते थे। सामान घोड़े-खच्चरों, याक और पोर्टरों के जरिए ढोया जाता था। खराब मौसम और भूस्खलन कई बार व्यापार रोक देते थे। कुमाऊं यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता सुमन जोशी के मुताबिक पहले सीमांत समुदाय नेपाल से चावल, जौ और गेहूं लेकर तिब्बत की ग्यानिमा और गरहाटोक मंडियों तक पहुंचते थे, जहां बदले में नमक और बोरेक्स लिया जाता था। कई जगह एक नाली चावल के बदले पांच नाली नमक तक का विनिमय होता था। अब सड़क बनने के बाद करीब 100 किलोमीटर तक वाहन सीधे सीमा के करीब पहुंच सकेंगे। सिर्फ अंतिम करीब 200 मीटर तक ही सामान पारंपरिक तरीके से ले जाया जाएगा। इसके बाद चीन क्षेत्र में सड़क मार्ग उपलब्ध रहेगा, जहां से व्यापारी करीब 18 किलोमीटर दूर तकलाकोट मंडी पहुंचेंगे। तकलाकोट की नई मंडी में मिलेंगी दुकानें व्यापार बंद रहने के दौरान तकलाकोट की पुरानी मंडी की कई दुकानें नेपाली और अन्य व्यापारियों को आवंटित कर दी गई थीं। अब नई ट्रेड मंडी विकसित की जा रही है। इसी नई मंडी में भारतीय व्यापारियों को दुकानें दी जाएंगी। व्यापार समिति का कहना है कि नई मंडी पहले के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित है और वहां सामान रखने के लिए अधिक जगह उपलब्ध होगी। भारतीय व्यापारियों के लिए रियायती किराए और बेहतर लॉजिस्टिक सुविधा की भी मांग की गई है। व्यापार से जुड़े लोगों का मानना है कि सड़क और आधुनिक सुविधाओं के कारण आने वाले वर्षों में कारोबार का दायरा और बढ़ सकता है। 2019 में करोड़ों का कारोबार 2019 में इस मार्ग से करीब तीन करोड़ रुपए का व्यापार हुआ था, जिसमें लगभग 1.25 करोड़ रुपए का निर्यात और 1.90 करोड़ रुपये का आयात शामिल था। अब सड़क और आधुनिक सुविधाओं के साथ व्यापार फिर शुरू होने जा रहा है, ऐसे में इस आंकड़े के काफी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। व्यापार बंद होने के कारण कई भारतीय व्यापारी अपना सामान तिब्बत की तकलाकोट मंडी में ही छोड़ आए थे। पिछले छह साल से करीब 45 व्यापारियों का एक करोड़ रुपए से ज्यादा का सामान वहां फंसा हुआ है। अब व्यापार शुरू होने से इन व्यापारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वे अपना सामान वापस ला सकेंगे या उसे बेच सकेंगे। सदियों से व्यापार, संस्कृति और भरोसे का रास्ता रहा लिपुलेख लिपुलेख दर्रा सिर्फ सीमा कारोबार का रास्ता नहीं, बल्कि सदियों से भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच संपर्क का प्रमुख मार्ग रहा है। सीमांत क्षेत्रों में लंबे समय तक वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित व्यापार चलता था। ब्रिटिश अधिकारी और लेखक सर फ्रांसिस एडवर्ड यंगहसबैंड ने अपनी किताब ‘इंडिया एंड तिब्बत’ में हिमालयी व्यापारिक रास्तों को भारत और तिब्बत के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क का माध्यम बताया था। इन रास्तों से सिर्फ सामान नहीं, बल्कि परंपराएं, भाषाएं और सीमांत समाजों के रिश्ते भी एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुंचते थे। तिब्बत के साथ यह संपर्क सिर्फ मंडियों तक सीमित नहीं था। सीमांत इलाकों के मेले, धार्मिक यात्राएं और कारोबारी काफिले भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच सामाजिक संबंधों का भी आधार बने हुए थे। जौलजीबी जैसे मेले लंबे समय तक त्रिपक्षीय व्यापारिक केंद्र के रूप में पहचाने जाते रहे। कौन हैं रं समुदाय, जिन्होंने जिंदा रखा हिमालयी व्यापार लिपुलेख दर्रे से होने वाले पारंपरिक व्यापार में रं समुदाय की सबसे अहम भूमिका रही है। यह समुदाय मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की ब्यास, दारमा और चौंदास घाटियों में निवास करता है। रं समाज को भोटिया या शौका समुदाय का हिस्सा भी माना जाता है। सदियों तक यही समुदाय दुर्गम हिमालयी रास्तों में भारत-तिब्बत व्यापार को जिंदा रखे हुए था। इनके रहन-सहन, खानपान और पहनावे में तिब्बती संस्कृति की झलक दिखाई देती है। यह समुदाय अपनी ऊनी बुनाई, लोक संस्कृति और सीमांत जीवनशैली के लिए जाना जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड में भोटिया जनजाति की आबादी 39 हजार से ज्यादा थी। व्यापार से पहले पी जाती थी शराब सुमन जोशी की एक सोध के अनुसार ऊंचे इलाकों में बर्फबारी होने पर कई भोटिया परिवार सर्दियों में नेपाल के निचले इलाकों में अस्थायी घर बनाकर रहते थे, जबकि गर्मियों में व्यापारिक काफिलों के साथ तिब्बत की मंडियों तक पहुंचते थे। नेपाल और तिब्बत के बीच यही सीमांत समुदाय कारोबारी पुल की तरह काम करता था। व्यापार शुरू करने से पहले भारतीय व्यापारियों और तिब्बती कारोबारियों के बीच ‘Share Chu-Dul Chyu’ नाम की मित्रता रस्म निभाई जाती थी। दोनों पक्ष चांदी के पात्र में शराब पीते, घी, सत्तू, ऊन और सोने को छूकर भरोसे का प्रतीक मानते थे। दोस्ती के प्रमाण के तौर पर पत्थर के टुकड़े तक संभालकर रखे जाते थे। नेपाल की आपत्ति से फिर चर्चा में आया सीमा विवाद लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर नेपाल पहले भी आपत्ति जता चुका है। 2019 में भारत सरकार के नए नक्शे के बाद नेपाल ने भी नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, जिसमें उसने इस पूरे क्षेत्र पर दावा किया था। बाद में नेपाल संसद ने भी इसे मंजूरी दे दी थी। नेपाल का दावा है कि यह इलाका उसका हिस्सा है, जबकि भारत सिगौली संधि के आधार पर इसे अपना क्षेत्र मानता है। यही वजह है कि भारत-चीन व्यापार और कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़ा यह पूरा इलाका रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है। ————— ये खबर भी पढ़ें : भारत से कैलाश पर्वत दर्शन के लिए करना होगा इंतजार: 2 माह बाद जारी होंगे परमिट; व्यू पॉइंट पर हर दिन बदलता रहता है मौसम तिब्बत स्थित पवित्र कैलाश पर्वत के भारत से दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं को अभी करीब दो महीने और इंतजार करना होगा। फिलहाल इनर लाइन परमिट (ILP) जारी नहीं किए जा रहे हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि सितंबर के आसपास परमिट शुरू होने पर आदि कैलाश और ओम पर्वत आने वाले श्रद्धालु 17 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित ओल्ड लिपुलेख (ओल्ड लिपुपास) जाकर भारत की सीमा से कैलाश पर्वत के दर्शन कर सकेंगे। पढ़ें पूरी खबर…

ऋषिकेश हाईवे पर 9 दिन से पेड़ों से चिपके प्रदर्शनकारी:4,369 वृक्षों की कटाई के विरोध में मना रहे 'ब्लैक हरेला'; दो साल की बच्ची के साथ मां का प्रोटेस्ट

पिछले नौ दिनों से हम यहीं बैठे हैं। हर साल हरेला पर पेड़ लगाते थे, लेकिन इस बार उन्हीं पेड़ों को बचाने के लिए धरना देना पड़ रहा है। विकास के नाम पर सदियों पुराने साल के जंगल काटे जा रहे हैं। आखिर यह कैसा हरेला है? यह कहते हुए प्रदर्शनकारी मनीष रावत सामने खड़े एक विशाल साल के पेड़ की ओर इशारा करते हैं। चेहरे पर नाराजगी है, लेकिन आवाज में बेबसी भी साफ झलकती है। देहरादून-ऋषिकेश मार्ग पर सात मोड़ के जंगल में हरेला के दिन दो तस्वीरें साथ-साथ दिखती हैं। पूरे उत्तराखंड में पौधारोपण का उत्सव मनाया जा रहा है, जबकि यहां करीब 300 लोग पेड़ों से चिपककर ‘ब्लैक हरेला’ मना रहे हैं। किसी के हाथ में काला पोस्टर है, तो किसी की तख्ती पर लिखा है – पेड़ बचाओ, भविष्य बचाओ’ और ‘जंगल नहीं बचेंगे तो जीवन नहीं बचेगा। दैनिक भास्कर ने हरेला के अवसर पर सात मोड़ पहुंचकर ग्राउंड जीरो पर आंदोलन, पेड़ कटान और दोनों पक्षों की दलीलों को समझा। लड़ाई केवल पेड़ों की नहीं, भविष्य की प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब एक ओर हजारों पेड़ों पर आरी चल रही हो और दूसरी ओर पौधारोपण का संदेश दिया जा रहा हो, तो यह विरोधाभास है। उनका कहना है कि यह आंदोलन सिर्फ पेड़ों को बचाने का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगल और पर्यावरण बचाने की लड़ाई है। ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना से शुरू हुआ यह विरोध अब स्थानीय आंदोलन से आगे बढ़कर उत्तराखंड में विकास बनाम पर्यावरण की बड़ी बहस का केंद्र बन गया है। एक पक्ष बेहतर सड़क और तेज कनेक्टिविटी की बात कर रहा है, तो दूसरा सवाल उठा रहा है कि क्या विकास की कीमत सदियों पुराने जंगलों से चुकाई जानी चाहिए। जहां जंगल था, वहां अब मशीनों की आवाज सात मोड़ पहुंचते ही जंगल की खामोशी की जगह मशीनों और आरी की आवाज सुनाई देती है। सड़क किनारे कई साल के पेड़ों पर लाल और पीले निशान बने हैं। कुछ पेड़ जमीन पर गिर चुके हैं, जबकि कई अब भी कटने का इंतजार कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि शुरुआत में करीब 173 पेड़ काटे गए थे। विरोध और लगातार बारिश के चलते कुछ दिनों तक कटान धीमा पड़ा, लेकिन उनका कहना है कि अब तक 350 से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की गई है। पूरी परियोजना में 4,369 पेड़ प्रभावित होने हैं। धरने पर बैठे प्रदर्शनकारी मनीष रावत का आरोप है कि अधिकारियों से कटान के आदेश मांगे गए तो सामान्य स्वीकृति संबंधी दस्तावेज दिखाए गए, लेकिन ऐसा कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिखाया गया जिसमें तत्काल कटान का निर्देश हो। उनका सवाल है कि यदि सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं तो फिर इतनी जल्दबाजी किस बात की है? कब शुरू हुई पेड़ों की कटाई? वन एवं पर्यावरण संबंधी मंजूरियां मिलने के बाद भानियावाला-जौलीग्रांट-ऋषिकेश फोरलेन परियोजना के तहत पेड़ काटने का काम शुरू हुआ। शुरुआती दिनों में बड़ी संख्या में साल के पेड़ों की कटाई होने लगी, जिसके बाद स्थानीय लोगों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने मौके पर पहुंचकर विरोध शुरू कर दिया। लगातार प्रदर्शन और बारिश के कारण कुछ दिनों तक कटान की रफ्तार धीमी रही, लेकिन अब काम फिर तेज हो गया है। इसके साथ ही धरना भी नौवें दिन में पहुंच चुका है। जब पौधारोपण के दिन पोस्टर उठे उत्तराखंड में हरेला प्रकृति और हरियाली का पर्व माना जाता है। हर साल इस दिन बड़े पैमाने पर पौधारोपण होता है, लेकिन इस बार सात मोड़ पर तस्वीर अलग थी। पौधों की जगह लोगों के हाथों में काले पोस्टर और बैनर थे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि एक ओर हजारों पेड़ों की कटाई हो रही है और दूसरी ओर पौधारोपण का उत्सव मनाया जा रहा है। इसी विरोधाभास को दिखाने के लिए उन्होंने हरेला के दिन ‘ब्लैक हरेला’ मनाने का फैसला किया। ‘मैं अपनी बेटी के भविष्य के लिए यहां खड़ी हूं’ धरना स्थल पर दो साल की बेटी को गोद में लेकर पहुंचीं रिसर्च स्कॉलर बबीता की आवाज भर्रा जाती है। वह कहती हैं, देहरादून से ऋषिकेश आते समय इन जंगलों को देखकर हमेशा सुकून मिलता था। अब इन्हीं पेड़ों को गिरते देख मन दुखी हो जाता है। बबीता का कहना है कि एक साल का पौधा विशाल वृक्ष बनने में दशकों लगा देता है, इनमें से कई साल के पेड़ दो-तीन सौ साल पुराने हैं। लेकिन उसे काटने में कुछ मिनट भी नहीं लगते। मैं यहां अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी बेटी के भविष्य के लिए खड़ी हूं।
जहां जाम नहीं, वहां फोरलेन क्यों? सामाजिक कार्यकर्ता शक्ति सिंह बर्त्वाल परियोजना की जरूरत पर सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि देहरादून के आढ़त बाजार, प्रिंस चौक और तहसील चौक जैसे इलाकों में रोज लंबा जाम लगता है, लेकिन सात मोड़ पर उन्होंने कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी। उनका कहना है कि जहां ट्रैफिक की वास्तविक समस्या है, वहां वर्षों से समाधान नहीं हुआ, जबकि जंगल वाले हिस्से में हजारों पेड़ प्रभावित हो रहे हैं। उनका आरोप है कि पर्यावरण के मुद्दे पर आवाज उठाने वाले कई बड़े चेहरे भी अब खामोश हैं। विरोध को मिला राजनीतिक समर्थन पेड़ कटान के विरोध में अब स्थानीय लोगों के साथ राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन भी खुलकर सामने आ गए हैं। हरेला के दिन आंदोलन स्थल पर आम आदमी पार्टी की देहरादून महानगर अध्यक्ष दीप्ति रावत भी पहुंचीं। उनका आरोप है कि हरेला पर पौधे लगाने की बात हो रही है, लेकिन उसी दिन हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। सरकार असली मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। आंदोलन में विभिन्न पर्यावरण संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र समूहों और स्थानीय नागरिकों ने भी भागीदारी की। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है। वहीं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि सात मोड़ की पहचान उसके घने जंगल हैं। उनका कहना है कि – सात मोड़ की प्राकृतिक पहचान खत्म नहीं होनी चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी है, सिर्फ ट्रांसलोकेशन का दावा समाधान नहीं है। परियोजना और दोनों पक्षों के दावे भानियावाला-जौलीग्रांट-ऋषिकेश फोरलेन परियोजना का उद्देश्य देहरादून, जौलीग्रांट एयरपोर्ट, ऋषिकेश और चारधाम यात्रा मार्ग पर यातायात को तेज और सुरक्षित बनाना है। एनएचएआई का कहना है कि इसके लिए वन क्षेत्र में सामान्य 60 मीटर की जगह 23 मीटर राइट ऑफ वे (ROW) रखा गया है, ताकि कम जंगल प्रभावित हो। प्राधिकरण के मुताबिक, प्रभावित 4,369 पेड़ों में से 754 का वैज्ञानिक ट्रांसलोकेशन किया जाएगा। साथ ही 40 हेक्टेयर भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण की योजना है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सैकड़ों साल पुराने साल के जंगलों की भरपाई नए पौधे लगाकर नहीं की जा सकती। उनका मानना है कि विकास जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत परिपक्व जंगलों को खोकर नहीं चुकाई जानी चाहिए। पर्यावरण बनाम विकास : असली बहस यही है यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है। एक पक्ष का तर्क है कि बेहतर सड़कें और मजबूत कनेक्टिविटी राज्य के विकास के लिए जरूरी हैं, जबकि दूसरा पूछता है कि क्या विकास की कीमत हजारों पेड़ों और जंगलों को खोकर चुकाई जानी चाहिए। पर्यावरणविद् आशीष गर्ग का कहना है कि दुनिया के कई देशों में अब सड़क परियोजनाएं इस तरह डिजाइन की जाती हैं कि पेड़ों की कटाई और जैव विविधता पर असर न्यूनतम हो। उनका मानना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में किसी परियोजना का आकलन सिर्फ पेड़ों की संख्या से नहीं, बल्कि पूरे वन तंत्र और स्थानीय पारिस्थितिकी पर उसके प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। वन्यजीवों पर कितना पड़ेगा असर? सात मोड़ का इलाका हाथियों समेत कई वन्यजीवों का प्राकृतिक कॉरिडोर माना जाता है। एनएचएआई का कहना है कि इनके सुरक्षित आवागमन के लिए एलीफेंट अंडरपास, बॉक्स कल्वर्ट, पाइप कल्वर्ट, साउंड बैरियर और नो-हॉर्न जोन जैसी व्यवस्थाएं बनाई जा रही हैं, ताकि सड़क का असर कम से कम हो। वहीं, वन और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में किसी भी सड़क परियोजना का आकलन केवल यातायात के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, प्रत्यारोपण, प्रतिपूरक वनीकरण और वन्यजीव कॉरिडोर की दीर्घकालिक निगरानी ही इसकी असली परीक्षा होगी। एनएचएआई का कहना है कि परियोजना सभी वन एवं पर्यावरणीय मंजूरियां मिलने के बाद शुरू की गई है और निर्माण कार्य तय कानूनी व पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप हो रहा है। प्राधिकरण का दावा है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की पूरी कोशिश की गई है। अब जानिए क्या है हरेला पर्व? उत्तराखंड में हरेला पर्व हर साल श्रावण संक्रांति (इस वर्ष 16 जुलाई) को मनाया जाता है। हालांकि राज्य सरकार, वन विभाग, स्कूलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से हरेला सप्ताह के तहत पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यक्रम कई दिन पहले ही शुरू हो जाते हैं। इसी दौरान पूरे प्रदेश में लाखों पौधे लगाए जाते हैं और लोगों को हरियाली बचाने का संदेश दिया जाता है। —————- ये खबर भी पढ़ें : उत्तराखंड में जंगल बचाने का नया हथियार बना ‘बीज बम’: 8 साल पहले शुरू हुई मुहिम अब 18 राज्यों तक पहुंची; प्रदेश सरकार भी जुड़ी मिट्टी का एक छोटा-सा गोला… लेकिन इसके भीतर छिपे हैं जंगलों को फिर से हरा-भरा बनाने वाले बीज। बारिश की कुछ बूंदें पड़ते ही यही गोला अंकुर बनकर पेड़-पौधों में बदल सकता है। उत्तराखंड में अब यही ‘बीज बम’ पर्यावरण संरक्षण का नया हथियार बनता जा रहा है। पढ़ें पूरी खबर…

7 डिजिट घोटाला:आरटीओ का रिवर्स गियर; 35 गाड़ियों के निरस्त रजिस्ट्रेशन चुपचाप बहाल, अधिकांश वीआईपी, नेता व वाहन डीलर

आठ महीने पहले परिवहन विभाग ने 7 डिजिट नंबर घोटाले की जांच रिपोर्ट जारी कर प्रदेशभर में करीब 9 हजार 500 नंबरों के गलत तरीके से बैकलॉग, वेरिफिकेशन और अप्रूवल कर आवंटित किए जाने का खुलासा किया था। जयपुर में 2129 नंबरों का गलत तरीके से आवंटन सामने आया था। इनमें से 250 नंबरों का सत्यापन नहीं हुआ तो इनकी आरसी (रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट) निरस्त कर दी गई थी। अब इसी मामले में नया मोड़ आ गया है। विभाग ने पांच महीने बाद उन्हीं वाहनों की आरसी दोबारा बहाल करनी शुरू कर दी है। 35 वाहनों की आरसी बहाल हो गई है। बाकी की प्रक्रिया चल रही है। बहाल हुए नंबरों में कई वीआईपी, कारोबारी, भाजपा से जुड़े नेता और वाहन डीलरों के हैं। आरसी बहाल पर विभाग का तर्क है कि वाहन मालिकों को 17 दिसंबर को वाहन के भौतिक निरीक्षण के लिए आरटीओ कार्यालय बुलाया गया था, लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए। 30 जनवरी 2026 को उनकी आरसी निरस्त कर दी गई। बाद में वाहन मालिकों ने आरटीओ के समक्ष अपील की। अपील पर दस्तावेजों और वाहन के भौतिक निरीक्षण में सब कुछ सही पाए जाने के बाद आरसी बहाल कर दी गई। जिनकी RC रद्द की थी, उन्हीं को सही बताकर बहाल किया केस 1; पहले निरस्त, फिर 4 माह बाद बहाल कार नंबर RRX-8802 की आरसी 30 जनवरी को डीटीओ ने गलत तरीके से नंबर आवंटन मानते हुए निरस्त कर दी। यह वाहन धनंजय सिंह पुत्र गजेंद्र सिंह के नाम दर्ज है। तीन महीने बाद 1 मई को आरटीओ ने नया आदेश जारी कर आरसी बहाल कर दी। केस 2; स्क्रैप सर्टिफिकेट के बाद बहाल कार RPH 4041 मैसर्स ऑरा अटायर के नाम दर्ज है। वाहन मालिक राजीव जिंदल ने सुनवाई में RPH 4041 और RJ60-CD-2441 के बीच नंबर स्वेपिंग की जानकारी देते हुए स्क्रैप सर्टिफिकेट दिया। कोई अनियमितता नहीं मिलने पर आरसी बहाल कर दी गई। केस 3; कई अन्य वाहनों की भी लौटी आरसी वाहन संख्या RNL 0542 मैसर्स प्रेम कृपा उद्योग, RNV 0034 आयुषी त्यागी, RJC 5700 मैसर्स स्प्रिंग डेल्स चिल्ड्रन्स स्कूल, कोटा और RNL 0015 यशोधर पांडे की आरसी भी 30 जनवरी को निरस्त की थी। बाद में भौतिक निरीक्षण में दस्तावेज सही बताते हुए आरसी बहाल कर दी। केस 4; स्वेपिंग बता कर लौटाई आरसी कार RNX 9909 मैसर्स सौभागमूल गोकुलचंद ज्वैलर्स के नाम दर्ज है। आरसी 30 जनवरी को निरस्त की। 18 मई को विभाग ने नए आदेश जारी कर आरसी बहाल कर दी। इसमें कहा कि RNX 9909 और RJ45-CV-1401 के बीच नंबर स्वेपिंग हुई थी, जो प्रक्रिया के तहत हुई। जयपुर में 2129 नंबर ​संदिग्ध ​मिले थे अक्टूबर 2025 में परिवहन विभाग की जांच में बड़ा खुलासा हुआ। प्रदेशभर में करीब 9500 वाहनों को गलत तरीके से 7 डिजिट नंबर आवंटित किए जाने की बात सामने आई। जांच में बैकलॉग, वेरिफिकेशन और अप्रूवल प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं मिलीं। जयपुर आरटीओ में अकेले 2129 नंबर संदिग्ध पाए गए। 1879 मामलों का सत्यापन हुआ, जबकि 250 वाहनों का सत्यापन नहीं होने पर उनकी आरसी निरस्त कर दी गई। अब इन्हीं निरस्त वाहनों में से 35 से अधिक वाहनों की आरसी दोबारा बहाल की जा चुकी है।

राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध में बड़ा खुलासा:किशनगढ़ का मार्बल डंपिंग यार्ड साइलेंट पॉल्यूशन बम…हवा-मिट्टी सब खतरे में

एशिया की सबसे बड़ी मार्बल मंडी किशनगढ़ बड़े पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ रही है। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय की जांच में पहली बार केवल हवा या पानी नहीं, बल्कि पूरे पर्यावरणीय तंत्र का एकीकृत अध्ययन किया गया। जांच में आया कि मार्बल स्लरी डंपिंग यार्ड हवा, मिट्टी, भूजल और मानव स्वास्थ्य को एक साथ प्रभावित करने वाला स्थायी स्रोत बन चुका है। पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा के नेतृत्व में 15 दिनों तक डंपिंग यार्ड में अध्ययन किया गया। इसमें एक्स-रे डिफ्रेक्शन, एटॉमिक एब्जॉर्प्शन स्पेक्ट्रोस्कोपी, जीआईएस और रिमोट सेंसिंग जैसी तकनीक उपयोग की गई। खुली मार्बल स्लरी डंपिंग का असर केवल डंपिंग स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका प्रभाव दूर-दूर तक फैल रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शोध “जर्नल ऑफ हैज़र्डस मैटेरियल्स एडवांसेज’ (एल्सेवियर) जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में सोमवार 13 जुलाई-2026 को प्रकाशित हुआ है। शोध में चेतावनी दी गई है कि यदि वर्तमान तरीके से खुले में मार्बल स्लरी का डंपिंग जारी रहा तो आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र कृषि उत्पादकता, पेयजल उपलब्धता, जैव विविधता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन जाएगा। रिपोर्ट ने इसे व्यावसायिक स्वास्थ्य का भी गंभीर संकट माना है। मिट्टी और भूजल में भारी धातुओं की मौजूदगी
शोध में मार्बल स्लरी के भीतर लेड (Pb) सिलिकेट और कॉपर सल्फेट जैसे भारी धातु यौगिकों की पहचान हुई। डंपिंग यार्ड के आसपास की मिट्टी में तांबा, जिंक और अन्य धातुओं की मात्रा अधिक मिली तथा दूरी बढ़ने के साथ इनकी सांद्रता कम होती गई। भूजल में बीमारियों का घर टीडीएस 3573 पीपीएम, कुल कठोरता 1010 मि.ग्रा./लीटर, लवणता, क्लोराइड, फ्लोराइड और आयरन स्वीकृत सीमा से काफी अधिक पाए गए। शोधकर्ताओं के अनुसार इससे पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है तथा लंबे समय तक ऐसे पानी के उपयोग से किडनी, हड्डियों और पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। खेती सिकुड़ रही, औद्योगिक क्षेत्र बढ़ रहा सैटेलाइट आधारित विश्लेषण से सामने आया कि वर्ष 2017 से 2022 के बीच डंपिंग यार्ड के आसपास कृषि भूमि लगातार कम हुई जबकि औद्योगिक एवं निर्मित क्षेत्र तेजी से बढ़े। निर्मित क्षेत्र 54.58 से बढ़कर 74.72 वर्ग किमी हो गया। कृषि भूमि में 2.58 प्रतिशत की कमी आई आैर वनस्पति लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि डंपिंग क्षेत्र मानचित्र में भले छोटा दिखाई दे रहा हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्रदूषण कम हुआ है। वास्तव में स्लरी अब आसपास के क्षेत्रों में फैलकर व्यापक पर्यावरणीय नुकसान पहुंचा रही है। भास्कर द्वारा कराई गई जांच में भी सामने आए यही तथ्य दैनिक भास्कर ने राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के सहयोग से किशनगढ़ मार्बल स्लरी डंपिंग यार्ड और उसके आसपास के क्षेत्रों में पोर्टेबल एयर मॉनिटरिंग मशीन से वायु गुणवत्ता की जांच करवाई थी। इस दौरान विभिन्न स्थानों पर हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों का आकलन किया गया। जांच में सामने आया कि डंपिंग यार्ड के आसपास धूलकण और प्रदूषण का स्तर सामान्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक है तथा इसका प्रभाव आसपास के वातावरण पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। बाद में राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ किए गए विस्तृत शोध में भी यही तथ्य प्रमाणित हुए। जांच में यह किया गया सर्वाधिक असर मजदूरों पर हवा में धूल राष्ट्रीय मानक से आठ गुना ज्यादा शोधार्थी बसंत बिजारणियां ने बताया कि – रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष वायु प्रदूषण को लेकर सामने आया। डंपिंग यार्ड के सबसे निकट वाले क्षेत्र में पीएम-2.5 का औसत स्तर 465 से 487 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया, जो राष्ट्रीय मानक से लगभग आठ गुना और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सीमा से 20 से 50 गुना अधिक है। यही कारण है कि सर्वे में आधे से अधिक स्थानीय लोगों और 70 प्रतिशत मार्बल श्रमिकों ने सांस लेने में तकलीफ, जबकि 84 प्रतिशत श्रमिकों ने गले की गंभीर समस्याएं बताईं।

डॉक्टरों की डिग्री और शोध की साख हुई तार-तार:न मरीज… न रिसर्च, 30 हजार में एमडी-एमएस और एक लाख में पीएचडी की रेडीमेड थीसिस

चिकित्सा और शैक्षणिक जगत से ऐसा चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, जिसने जिसने डॉक्टरों की डिग्री और शोध की साख तार-तार कर दी है। भास्कर पड़ताल में आया है कि पीजी और पीएचडी की थीसिस बाजार में बिक रही हैं। एमडी-एमएस करने वाले रेजिडेंट अस्पतालों में मरीजों पर शोध करने के बजाय 20 से 50 हजार में खरीद रहे हैं। वहीं, पीएचडी शोधार्थी 80 हजार से एक लाख रुपए में डॉक्टर की उपाधि हासिल कर रहे हैं। आरएनटी मेडिकल कॉलेज और एमबी चिकित्सालय के सामने कारोबार चल रहा है। उदयपुर के एक सरकारी सहित 6 मेडिकल कॉलेजों में सैकड़ों छात्र विशेषज्ञता की पढ़ाई करते हैं, जिनके क्लीनिकल रिसर्च डेटा की विश्वसनीयता पर अब गंभीर सवाल खड़े होते हैं। एथिकल कमेटी और गाइड के सुपरविजन पर सवाल हर मेडिकल कॉलेज में इंस्टीट्यूशनल एथिकल कमेटी शोध के नैतिक और वैज्ञानिक पहलुओं की जांच करती है। तीन वर्षों तक मरीजों के फॉलो-अप और लैब टेस्ट की निगरानी गाइड की जिम्मेदारी होती है। जबकि 24 घंटे में थिसिस तैयार होने का दावा बताता है कि व्यावहारिक स्तर पर डेटा का पर्याप्त सत्यापन नहीं हो रहा। केस-1 : मरीज की जरूरत नहीं, गाइड की मंजूरी ले आओ भास्कर रिपोर्टर पीजी डॉक्टर का साथी बनकर आरएनटी के सामने संचालित बापना एजेंसीज पहुंचा। संचालक संदीप बापना से प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन (पीएसएम) विभाग की थीसिस तैयार कराने की बात हुई तो ये चौंकाने वाले दावे सामने आए। केस-2 : हमारा काम सॉफ्टवेयर भी नहीं पकड़ पाता भास्कर टीम सुविवि मार्ग पहुंची। बोहरा गणेशजी मंदिर मार्ग स्थित विनायक कम्प्यूटर पर पवन ने थीसिस तैयार करने वालों के नंबर दिए। इन्हीं नंबरों पर रिपोर्टर ने हितेश नासा से संपर्क किया। उनसे बातचीत… पीएचडी की थीसिस लिखवानी है, काम हो जाएगा क्या?
हां, सिर्फ टॉपिक दीजिए, पूरी थीसिस तैयार कर देंगे। खर्च कितना आएगा?
80 हजार से 1 लाख रु. लगेंगे। पीएचडी करने वाले को एक अक्षर भी लिखने की जरूरत नहीं। प्लेजियरिज्म जांच सख्त है, दिक्कत तो नहीं होगी?
हम ऐसा लिखते हैं कि सॉफ्टवेयर में न फंसे। एमपी के कई कॉलेजों में जांच नहीं होती, लेकिन कड़ाई है, इसलिए मेहनत ज्यादा लगती है। सिनॉप्सिस जमा होने के बाद पर्याप्त समय मिलता है। थीसिस बिकना अनैतिक, तुरंत लगे रोक : प्रिंसिपल
आरएनटी मेडिकल कॉलेज में एथिकल कमेटी थीसिस की जांच करती है। बाजार में ऐसी थीसिस बिक रही है तो गलत है।
-डॉ. राहुल जैन, प्रधानाचार्य, आरएनटी मेडिकल कॉलेज, उदयपुर भास्कर एक्सपर्ट : राज्य स्तर पर हो नीतिगत बदलाव
ऐसे मामले अधिकतर निजी विवि में सामने आते हैं, लेकिन व्यवस्था सुधार की जरूरत सरकारी विवि में भी है।
-डॉ. कैलाश सोड़ानी, पूर्व कुलपति, वर्धमान महावीर खुला विवि

राजीव गांधी उद्यान में गुपचुप तरीके से शुरू किया काम:यूडीए ही तोड़ रहा नियम, फतहसागर के नो कंस्ट्रक्शन जोन में कर रहा निर्माण

शहर की लाइफलाइन फतहसागर झील को कंक्रीट से बचाने के लिए बने सख्त नियमों की धज्जियां खुद उदयपुर विकास प्राधिकरण (यूडीए) उड़ा रहा है। ऐतिहासिक गुलाबबाग में मसाला चौक और पार्किंग निर्माण पर हाईकोर्ट के सख्त आदेश के बावजूद सबक नहीं लिया जा रहा है। अब फतहसागर से सटे संवेदनशील व पूरी तरह निर्माण निषेध घोषित जी-1 (ग्रीन जोन-1) क्षेत्र के राजीव गांधी उद्यान में गुपचुप तरीके से पक्का निर्माण शुरू कर दिया गया है। मौके पर जेसीबी मशीनों से गहरी खुदाई कर ईंट, सीमेंट, रेत, सरिए और पत्थरों की पक्की दीवारें व कंक्रीट के व्यावसायिक स्ट्रक्चर (दुकानों के फाउंडेशन) खड़े किए जा रहे हैं। दरअसल, यूडीए यहां जयपुर की तर्ज पर एक स्थायी व्यावसायिक मसाला चौक और नाइट बाजार (फूड कोर्ट) विकसित करने की तैयारी में है। इस कदम को लेकर पर्यावरणविदों और जागरूक नागरिकों में भारी आक्रोश है। गुलाबबाग मामले में हाईकोर्ट के पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन और हेरिटेज संरक्षण के ऐतिहासिक फैसले को ताक पर रखकर किया जा रहा यह कृत्य सीधे तौर पर अदालती अवमानना को न्योता दे रहा है। यदि समय रहते रोक नहीं लगी, तो एक बार फिर टैक्स पेयर्स के लाखों रुपयों का पानी होना तय है और नाइट बाजार की अवधारणा पर भी ग्रहण लग जाएगा। हालांकि, टूरिस्ट सिटी के लिए नाइट बाजार आवश्यक है, लेकिन इसके लिए उद्यान में स्थायी कंक्रीट ढांचा खड़ा करने के बजाय अस्थायी निर्माण से भी मसाला चौक बनाया जा सकता है। फिलहाल, इस मामले पर यूडीए अधिकारियों और इंजीनियर्स ने चुप्पी साध रखी है। मास्टर प्लान : फतहसागर से सटा पूरा क्षेत्र ग्रीन जोन घोषित यूडीए के अपने ही मास्टर प्लान 2031 के अनुसार फतहसागर से सटा यह पूरा क्षेत्र जी-1 (ग्रीन जोन-1) यानी नो-कंस्ट्रक्शन जोन घोषित है। इस श्रेणी की जमीन पर केवल सघन पौधरोपण, पर्यावरण-अनुकूल नर्सरी और प्राकृतिक बागवानी की ही कानूनी अनुमति है। यहां ईंट, सीमेंट या कंक्रीट का कोई भी नया ढांचा खड़ा करना संगीन गैर-कानूनी कृत्य माना जाता है। यूडीए अक्सर आम जनता को जी-1 भूमि पर फार्महाउस या कोई भी पक्का निर्माण करने पर सीलिंग और ध्वस्तीकरण की सख्त कार्रवाई की चेतावनी देता है। लेकिन जब अपनी ही योजनाओं की बात आई, तो प्राधिकरण ने खुद के नियमों को ताक पर रख दिया। गुलाबबाग : करोड़ों का नुकसान और कोर्ट की फटकार भी भूले नगर निगम ने जयपुर के मसाला चौक की तर्ज पर ऐतिहासिक गुलाबबाग (सज्जन निवास बाग) में भी फूड कोर्ट और गवर्नमेंट प्रेस के सामने कंक्रीट पार्किंग का निर्माण शुरू कराया था। तब पर्यावरण प्रेमियों की याचिका पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए निर्माण पर तुरंत रोक लगा दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक उद्यान और ऐतिहासिक स्थल नागरिकों को खुली हवा देने के लिए हैं, न कि व्यावसायिक गतिविधियों और कंक्रीट चौपाटी संस्कृति के लिए। गुलाबबाग में हुए करोड़ों के नुकसान के बाद भी यूडीए बिल्कुल वैसी ही गलती दोहरा रहा है, जिससे यह नया निर्माण भी अदालती रोक की कगार पर खड़ा है। विकास और पर्यावरण में संतुलन जरूरी विकास और पर्यावरण में संतुलन जरूरी है, लेकिन विकास की आड़ में पर्यावरण को निगल जाना समझदारी नहीं है। नगर निगम ने गुलाबबाग में कंक्रीट का जाल बिछाने की जिद की थी, जिसका हश्र कोर्ट के स्टे के रूप में सामने आया। अब वही जिद यूडीए फतहसागर के किनारे दोहरा रहा है। प्रशासन को समझना होगा कि उदयपुर अपनी प्राकृतिक झीलों और हरियाली की वजह से ही दुनिया भर के पर्यटकों को खींचता है, न कि कंक्रीट के बाजारों की वजह से। यदि मसाला चौक बनाना ही है, तो राजीव गांधी उद्यान में अस्थायी निर्माण किया जा सकता है या फिर इसे शहर के अन्य व्यावसायिक स्थलों पर ले जाया जा सकता है, लेकिन ग्रीन लंग्स को कुर्बान करना कतई उचित नहीं है।