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श्रीजी जायन्ट्स ग्रुप की नई कार्यकारिणी ने ली शपथ

ब्यावर| जायन्ट्स वेलफेयर फाउंडेशन फेडरेशन-9 के तहत जायन्ट्स ग्रुप ऑफ श्रीजी ब्यावर का वर्ष 2026-27 का पदस्थापना समारोह हुआ। संस्था अध्यक्ष जान्हवी भारवानी ने बताया कि केन्द्रीय कमेटी सदस्य देवेन्द्र गेलड़ा मुख्य अतिथि रहे। फेड-9 अध्यक्ष कुसुम जैन मौजूद रहीं। यूनिट डायरेक्टर डॉ. फूल कौर मुंद्रा विशिष्ट अतिथि रहीं। अतिथियों ने अध्यक्ष जान्हवी भारवानी के साथ नवगठित कार्यकारिणी को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाई। मुख्य अतिथि देवेंद्र गैलरा ने श्रीजी ग्रुप के सामाजिक, सेवा व जनकल्याण के कामों के बारे में बताया। प्रदेश अध्यक्ष कुसुम जैन ने नई टीम से आगामी कार्यों की रूपरेखा पर चर्चा की। फूल कौर मूंदड़ा ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम में महेंद्र छाजेड़, सुरेश रांका, हरीश सांखला, दमयंती जयपाल, दीक्षा आनन्दानी, नरेश भारवानी, विक्रम सोनी सहित अन्य मौजूद रहे।

खाद-बीज बेचने वालों पर कृषि विभाग की नजर,तीन माह में 420 नमूने ले जांच के लिए भेजे…गत साल लिए 1467 में से 13 अमानक

भास्कर न्यूज | भीलवाड़ा खरीफ सीजन में किसानों को नकली खाद और बीज की बिक्री से बचाने के लिए कृषि विभाग ने जिलेभर में विशेष सघन जांच अभियान चला रखा है। अभियान के तहत खाद-बीज विक्रेताओं और निर्माण इकाइयों से लगातार नमूने लेकर उन्हें जांच के लिए विभाग की मुख्यालय स्थित प्रयोगशाला भेजा जा रहा है। जांच में कोई नमूना नकली या निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं मिलने पर संबंधित विक्रेता के खिलाफ न्यायालय में इस्तगासा पेश कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। कृषि विभाग के अनुसार अब तक 420 नमूने एकत्र कर जांच के लिए भेजे जा चुके हैं। इनमें 250 खाद के नमूने विभिन्न फैक्ट्रियों के अलग-अलग बैचों से, 68 खाद के नमूने जिले की दुकानों से तथा 102 बीज के नमूने विभिन्न बीज विक्रेताओं से लिए गए हैं। विभाग का कहना है कि खरीफ सीजन में खाद और बीज की मांग बढ़ने के साथ नकली एवं अमानक सामग्री की बिक्री की आशंका भी बढ़ जाती है। इसे देखते हुए जिलेभर में निरीक्षण कर नियमित रूप से सैंपल लिए जा रहे हैं। यह विशेष अभियान 15 जुलाई तक जारी रहेगा। कृषि विभाग ने गत साल भी सालभर में बीज के 503, खााद फैक्ट्रीयों से खाद के 900 और 64 कीटनाशकों के नमूने लेकर जांच के लिए विभाग की प्रयोगशाला में भेजे, जहां से 13 नमूने अमानक पाए गए। शहर व जिले में करीब 850 निजी दुकानों के साथ ही ग्राम सेवा सहकारी समितियां व क्रय-विक्रय सहकारी समितियां किसानों को खरीफ की बुवाई के लिए खाद-बीज की बिक्री कर रही है। किसान यहां से खाद के साथ ही बीज भी खरीद रहे है। ऐसे में उनके साथ कोई धोखा नहीं हो जाए, इसे देखते हुए कृषि विभाग के अधिकारी लगातार खाद-बीच के नमूने ले रहे हैं। साथ ही अमानक खाद और बीज नहीं रखने की हिदायत भी दी जा रही है। निजी दुकानों के साथ ही सहकारी समितियां विक्रय करती है खाद-बीज

वाट के नाम पर निगम की ‘वॉट:5 हजार की ब्रांडेड बॉडी में 200 की चाइनीज LED प्लेट, मेंटेनेंस पर 13.60 करोड़ खर्च

प्रदेशभर की सड़कों पर नगर निगम ऐसी स्ट्रीट लाइटें लगा रहा है, जो दूर से चमकती दिखती हैं, लेकिन सड़क पर उनकी पूरी रोशनी भी नहीं पहुंच पाती है। यानी पोल के नीचे उजाला और आगे अंधेरा। भास्कर टीम ने एक्सपर्ट के साथ जयपुर के विद्याधर नगर और मानसरोवर सेक्टर-8 में मौके पर रियलिटी चेक किया। लाइटें खुलवाकर अंदर के पार्ट्स की जांच में सामने आया कि बाहर से एमआई और बजाज जैसी ब्रांडेड दिखने वाली लाइटों में अंदर सस्ती चाइनीज एलईडी प्लेट लगी है। 5000 हजार रुपए की ब्रांडेड बॉडी में 200 रुपए की लाइट मिली। कई लाइटों में न एलईडी ड्राइवर मिला और न ही सर्ज प्रोटेक्शन डिवाइस (एसपीडी) है। नगर निगम में स्ट्रीट लाइट मेंटेनेंस के नाम पर घटिया सामग्री लगाने का भी मामला सामने आया है। खराब हो रही लाइटों की जगह कम गुणवत्ता वाली लाइटें लगाई जा रही हैं, जो जलती तो हैं, लेकिन उनका फोकस सड़क पर नहीं पड़ता। प्रदेश में 14.50 लाख लाइटें पहले से लगीं, निकायों ने 1.50 लाख लगाईं; 2 लाख और लगाने का लक्ष्य केंद्र के स्ट्रीट लाइटिंग नेशनल प्रोग्राम के तहत 2024 तक राजस्थान में 14.50 लाख एलईडी स्ट्रीट लाइटें लग चुकी थीं। निकायों ने अपने स्तर पर 1.50 लाख लाइटें लगाईं। राज्य सरकार ने 2 लाख और लाइटें लगाने की घोषणा की है। सब गोलमाल है… मेंटेनेंस का बिल पूरा, खर्च कम; ठेकेदार को ज्यादा भुगतान यदि किसी ठेकेदार के पास 10 हजार पॉइंट हैं, तो 40 रुपए प्रति पॉइंट के हिसाब से उसे हर माह 4 लाख रुपए मिलते हैं। जांच में सामने आया कि वह करीब 50 हजार रुपए का घटिया सामान लगा रहा है। चाइनीज प्लेटें लगी हैं; ड्राइवर-SPD गायब पहले ठेकेदार, अब निगम संभाल रहा मेंटेनेंस, खर्च बढ़ा पहले ईईएसएल कंपनी के पास 1.26 लाख एलईडी लाइटों और मेंटेनेंस का काम था। जयपुर के मानसरोवर, विद्याधर नगर, वैशाली नगर, सिविल लाइंस और झोटवाड़ा जोन इसमें शामिल थे। निगम कंपनी को 25 रुपए प्रति पॉइंट भुगतान कर रहा था। दिसंबर 2024 में कंपनी का कार्यकाल समाप्त होने के बाद मेंटेनेंस निगम की लाइट शाखा ने संभाला। जेडीए से ली गई 30 हजार लाइटें भी निगम मेंटेन कर रहा। ठेकेदारों को 40-80 रुपए/लाइट भुगतान कर रहे। 17 माह में 13.60 करोड़ खर्च हुए। यानी हर माह 80 लाख रुपए। 60 वाट की जगह 10 लक्स, मुख्य सड़कों पर भी मानक से कम रोशनी

3 साल में तीसरा हादसा:दुर्गानर्सरी तिराहे पर 50 साल पुराने नाले पर 30 फीट सड़क धंसी, कार भी फंसी

शहर के बीचोबीच दुर्गानर्सरी तिराहे पर रविवार देर रात को 50 साल पुराने नाले का 30 फीट का हिस्सा जमीन में धंस गया। इसमें एक कार भी फंस गई। गनीमत रही कि रात होने के कारण कोई वाहन नहीं थे और जनहानि टल गई। तीन साल में यह तीसरा हादसा है। नाले की जर्जर हालत ने नगर निगम की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए है। पहले दो कारें नाले में समा गईं, फिर सड़क धंस गई और अब 4 फीट का अंदर सड़क धंस गई है। हर बार निगम सिर्फ अस्थायी मरम्मत तक सीमित रहा। शक्तिनगर स्थित अंबामाता मंदिर से दुर्गा नर्सरी चौराहे तक पुराने नाले के पुनर्निर्माण के लिए निगम पहले ही करीब 3 करोड़ रुपए का टेंडर और वर्क ऑर्डर जारी कर चुका है। निर्माण एजेंसी दो-चार दिन में काम शुरू करने वाली थी। लेकिन उससे पहले ही नाले ने फिर जवाब दे दिया। अब मंगलवार से पुनर्निर्माण शुरू किया जाएगा। अगस्त 2024 में निगम ने 16 लाख रुपए खर्च कर नाला व सड़क की मरम्मत की थी। लेकिन, 50 साल पुराने नाले की कमजोर संरचना को बदलने का निर्णय समय पर नहीं लिया गया। ऐसे में हालात और बिगड़ते रहे। नाले की आरसीसी स्लैब के भीतर लगे सरिए पूरी तरह जंग खा चुके हैं, ऐसे में वह सड़क और वाहनों का भार नहीं झेल पा रहे है। इसका नतीजा यह रहा कि सड़क बार-बार नाले में धंस रही है। ऐसे निगम अब नाले के पुनर्निर्माण के लिए 3 करोड़ रुपए का काम शुरू किया जा रहा है। सवाल यह है कि अगर यह फैसला पहले लिया गया होता तो ये हादसे बार-बार नहीं होते। अब एहतियात : गड्ढे के पास बेरिकेड्स और होमगार्ड लगाए, रास्ता वनवे किया शक्ति नगर से आयड़ नदी तक 800 मीटर का नाला बना है। दुर्गानर्सरी चौराहे पर राडाजी मंदिर के पास अशोक नगर रोड के मुड़ाव पर 30 फीट लंबा हिस्सा जमीन में धंस गया। ऊपर ही खड़ी कार भी आधी अंदर लटक गई। चौराहे मौजूद यातायात पुलिसकर्मियों ने तुरंत यातायात को डायवर्ट किया और निगम को सूचना दी। निगम अधिकारियों ने मौका निरीक्षण किया और गड्ढे के आस-पास बेरिकेड्स लगवा दिए। ‎रात के समय सावधानी के लिए होमगार्ड‎ लगाए गए। साथ ही मार्ग को वनवे कर दिया गया है। ये दो हादसे पहले हो चुके समय पर जांच जरूरी : शहर के पुराने आरसीसी नालों की तय अंतराल पर तकनीकी जांच नहीं होने से ऐसे हादसों का खतरा लगातार बढ़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार 40-50 वर्ष पुराने ढांचों की नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट, स्लैब की भार वहन क्षमता की जांच और सरियों में जंग का परीक्षण किया जाना चाहिए। भारी यातायात वाले मार्गों पर यह प्रक्रिया और अधिक जरूरी मानी जाती है। समय रहते कमजोर हिस्सों की पहचान कर उनका पुनर्निर्माण कर दिया जाए तो सड़क धंसने, यातायात बाधित होने और जनहानि जैसी घटनाओं से बचा जा सकता है। इससे बार-बार होने वाली अस्थायी मरम्मत पर होने वाला अतिरिक्त सरकारी खर्च भी कम किया जा सकता है।

महिलाओं ने खेल, गीत, नृत्य किए

ब्यावर| अखिल भारतीय अग्रवाल महिला संगठन ने सावन के आगमन पर सावन स्वागत उत्सव आयोजित किया। कार्यक्रम में राजस्थानी थीम पर चंगा-पो, चरमींग, सतोलिया, चेयर रेस सहित कई खेल हुए। सावन के गीतों पर महिलाओं ने नृत्य किया। कार्यक्रम संगठन अध्यक्ष ललिता जालान, महामंत्री ट्विंकल अग्रवाल के नेतृत्व में हुआ। कार्यक्रम में उर्मिला गुप्ता, शशि मोदी, मनीषा जैन, अनु जिंदल, अर्चना मित्तल, नंदनी गोयल सहित अन्य मौजूद रही।

खान विभाग का कड़ा आदेश:सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी के बिना अरावली में नहीं चलेंगी माइनिंग मशीनें, लंबित खनन प्रस्तावों को अब सिर्फ सशर्त पर्यावरण मंजूरी

अरावली पर्वत शृंखला को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बीच खान एवं भूविज्ञान निदेशालय ने एक बड़ा और कड़ा आदेश जारी किया है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों के मद्देनजर अरावली क्षेत्र के लंबित पड़े माइनिंग प्रस्तावों को अब केवल सशर्त पर्यावरण स्वीकृति (कंडीशनल ईसी) मिलेगी। हालांकि, इस मंजूरी के बाद भी पट्टाधारक सीधे तौर पर जमीन की सफाई या खनन कार्य शुरू नहीं कर पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के तीन बड़े फैसलों का हवाला: खान विभाग के अतिरिक्त निदेशक (पर्यावरण एवं विकास) महेश माथुर द्वारा जारी सर्कुलर में सुप्रीम कोर्ट के तीन बड़े आदेशों (9 मई 2024, 29 दिसंबर 2025 और 26 फरवरी 2026) का हवाला दिया गया है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) की 25 अगस्त, 2010 की रिपोर्ट में तय अरावली पॉलीगॉन के दायरे में आने वाले सभी प्रस्तावों पर यह नियम सख्ती से लागू होगा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व लीज डीड पर भी ब्रेक मंजूरी के बाद भी ये 2 शर्तें लागू होंगी

सरकारी तिजोरी में कैद 64 करोड़ का सोना-चांदी:कैग ने कहा- नीलाम करो; अपराधियों से किया गया था जब्त

अपराधियों से जब्त ‌‌64.44 करोड़ रुपए का 29.011 किलो सोना और 972.75 किलो चांदी सरकारी खजाने में ‘कबाड़’ हो रही है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की लेटेस्ट समीक्षा रिपोर्ट में सामने आया है कि ये सोना-चांदी बरसों से सरकारी खजाने में रखे हैं, लेकिन अभी तक इसका नियमानुसार निस्तारण नहीं हो पाया है। कैग ने पहली बार इस तरह की जानकारी साझा की है। रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस और विभिन्न प्रवर्तन एजेंसियों ने ये जब्ती की है। इसे कोर्ट ने राजकीय संपत्ति घोषित किया है। हालांकि, वित्त विभाग ने इनकी वैल्यूएशन करवा ली है। रिपोर्ट में बताया गया है कि मई 2025 तक निस्तारण नहीं हुआ है। कैग ने इसे गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से जरूरी कार्रवाई की सिफारिश की है। यानी इसकी नीलामी करने को कहा है। रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान कोषागार नियमावली-2012 के नियम 122 के तहत कोषालय जयपुर (शहर) को राज्य का रिजर्व कोषागार घोषित किया गया है। सामान्य और आपराधिक मामलों में कोर्ट की ओर से राजकीय (सरकारी) संपत्ति घोषित किए गए सोना, चांदी, हीरे और अन्य बहुमूल्य सामान यहीं जमा किए जाते हैं। वित्त विभाग ने बहुमूल्य सामग्री को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। पहली कैटेगरी पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं की है। इन्हें पुरातत्व विभाग को हस्तांतरित किया जाना है। दूसरी कैटेगरी के तहत रखे सोना-चांदी को मुंबई स्थित सरकारी की टकसाल में भेज शुद्ध धातु में परिवर्तित करा बेचना है। कर चुके हैं वैल्यूएशन उधर, कैग ने पाया कि पुरातात्विक महत्व की सामग्री को छोड़कर बाकी सोना-चांदी का वैल्यूएशन तो हो चुका था, लेकिन नियमानुसार निस्तारण नहीं किया गया। इसे देखते हुए निदेशक एवं पदेन संयुक्त शासन सचिव, निदेशालय कोष एवं लेखा को सिफारिश की गई है कि राज्य सरकार के सक्षम स्तर से आवश्यक निर्देश जारी कर कोषाधिकारी जयपुर (शहर) के सुरक्षित कक्ष में रखे सोने-चांदी के आइटमों का नियमानुसार निस्तारण कराया जाए। नियम- गलाकर बेचे सरकार कोर्ट की ओर से राजकीय संपत्ति घोषित सोना, चांदी, हीरे आदि को रिजर्व कोषागार जयपुर (शहर) को समय-समय पर पुरातात्विक महत्व की सामग्री पुरातत्व विभाग को सौंपनी होती है। वहीं, अन्य बहुमूल्य सामग्री को मुंबई स्थित भारत सरकार की टकसाल भेजकर शुद्ध धातु में बदलना और मॉनेटाइज करना पड़ता है। कैग ने यह उठाई आपत्ति सोना-चांदी का वैल्यूएशन होने के बावजूद मई 2025 तक नियमानुसार निस्तारण नहीं हुआ। लंबित प्रक्रिया शीघ्र पूरी करे। समय से निस्तारण नहीं होने से सरकार पर इसकी सुरक्षा और रखरखाव का खर्च बढ़ रहा है। इससे सरकार को नुकसान हो रहा है। …और इधर हिसाब-किताब भी ठीक नहीं 35 साल बाद भी 17 मामलों में सरकार नहीं दे सकी 29.79 करोड़ रुपए के खर्च का हिसाब कैग की रिपोर्ट में समाने आया कि विभिन्न सरकारी विभागों में सरकारी धन के उपयोग का हिसाब 35 वर्ष बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। कैग के मुताबिक, 17 एडवांस कंटींजेंसी (एसी) बिलों के बदले निर्धारित समय में डिटेल्ड कंटींजेंसी (डीसी) बिल जमा नहीं किए गए। इन लंबित मामलों में करीब 29.79 करोड़ का समायोजन अभी तक बाकी है। इनमें कुछ मामले 1990-91 से यानी करीब 35 वर्ष से लंबित हैं। इनके खर्च का पूरा लेखा-जोखा सरकार उपलब्ध नहीं करा सकी। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार एसी बिलों के माध्यम से विभाग को तत्काल जरूरत के लिए राशि जारी की जाती है। नियमों के तहत निर्धारित अवधि के भीतर संबंधित विभागों को डीसी बिल प्रस्तुत कर यह बताना होता है कि पैसा किस मद में और किस उद्देश्य से खर्च किया गया। लेकिन 17 मामलों में यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। कैग ने इसे वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन माना और सभी लंबित मामलों का शीघ्र निस्तारण करने की सिफारिश की है।

उच्च शिक्षा पर दिखाने लगा असर:गिग इकोनॉमी के फेर में खाली हो रहे क्लासरूम, प्रदेश के कॉलेजों में नामांकन 4.23 प्रतिशत तक गिरा

राजस्थान में गिग इकोनॉमी और त्वरित कमाई का बढ़ता आकर्षण अब उच्च शिक्षा पर असर दिखाने लगा है। उच्च शिक्षा विभाग के वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन (2025-26) के विश्लेषण में सामने आया है कि यूजी-पीजी में नामांकन इस सत्र में 4.23% घटकर 12.55 लाख रह गया। यह लगातार दूसरा साल है, जब उच्च शिक्षा में निगेटिव ग्रोथ दर्ज हुई है। महामारी के दौरान बढ़ा नामांकन भी अब सिकुड़ चुका है। सबसे ज्यादा असर लड़कों पर दिखा है, जिनके नामांकन में 5.60% की गिरावट आई है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि गिग सेक्टर में तेजी से बढ़ते अवसर युवाओं को सीधे वर्कफोर्स की ओर खींच रहे हैं। इस गिरावट के बीच उदयपुर संभाग मजबूत अपवाद बनकर उभरा है। प्रदेश में प्रति कॉलेज औसतन 513 विद्यार्थी हैं, जबकि उदयपुर के सुविवि से संबद्ध कॉलेजों में यह आंकड़ा लगभग दोगुना 1,030 विद्यार्थी प्रति कॉलेज है। डिग्री का दबदबा, 71% विद्यार्थी सिर्फ आर्ट्स में प्रदेश के 71.10% विद्यार्थी अकेले कला संकाय में नामांकित हैं। भीड़ की प्रमुख वजह कम फीस और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पात्रता है। रोजगार की गारंटी नहीं होने के बावजूद यह संकाय सबसे अधिक विद्यार्थियों को आकर्षित कर रहा है। लड़कों के नामांकन में 5.60 प्रतिशत की बड़ी गिरावट : विभागाध्यक्ष सुविवि के लोक प्रशासन विभागाध्यक्ष डॉ. गिरिराज सिंह चौहान के अनुसार उच्च शिक्षा में सबसे चिंताजनक संकेत लड़कों के नामांकन में 5.60% और लड़कियों में 3.12% की गिरावट है। वर्तमान में कुल नामांकन में 55.91% हिस्सेदारी छात्राओं की है। डॉ. चौहान के अनुसार आर्थिक दबाव और त्वरित कमाई की चाहत के चलते बड़ी संख्या में युवा लॉजिस्टिक्स, रिटेल, सिक्योरिटी सर्विसेज, डिलीवरी और राइड-शेयरिंग जैसे गिग सेक्टर में जा रहे हैं। संविदा व अस्थायी नौकरियों के बढ़ते अवसरों से वे बीए-बीकॉम जैसी तीन वर्षीय डिग्री के बजाय सीधे रोजगार चुन रहे हैं। उम्मीद बाकी…उदयपुर संभाग बना हाई इनरोलमेंट मॉडल उच्च शिक्षा में उदयपुर संभाग हाई इनरोलमेंट-लो इंस्टीट्यूशनल शेयर मॉडल का उदाहरण बनकर उभरा है। राज्य के कुल महाविद्यालयों में इसकी हिस्सेदारी महज 5.3% (207 कॉलेज) है, लेकिन कुल छात्र नामांकन में संभाग अकेले करीब 8% (2.25 लाख) का भार संभाल रहा है। आदिवासी बहुल यह क्षेत्र अपने जिलों के साथ-साथ सिरोही तथा गुजरात और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी आकर्षित कर रहा है। कम कॉलेजों में अधिक छात्र होने से यहां संसाधनों का उपयोग राज्य में सबसे अधिक है। प्रदेश में हर 100 लड़कों पर 129 लड़कियां उच्च शिक्षा में…
आंकड़ों का दूसरा बड़ा संकेत जेंडर गैप का उलटना है। अब राज्य में हर 100 लड़कों पर 129 लड़कियां उच्च शिक्षा में नामांकित हैं।

जेडीए की दोहरी कार्यशैली:3 किमी लंबी, 24 मीटर चौड़ी सेक्टर रोड 10 साल से अधूरी; 900 मीटर हिस्से में सड़क नहीं बनाने से कब्जे

जेडीए शहर में एक तरफ सेक्टर रोड बनाने के लिए दुकान-मकान ध्वस्त कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सेक्टर रोड के लिए खाली पड़ी जमीनों पर धड़ल्ले से अतिक्रमण हो रहे हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है। दस साल पहले जेडीए ने पीआरएन नॉर्थ में जयपुर-दिल्ली एक्सप्रेस-वे को गोकुलपुरा, करणी विहार, कनकपुरा और रामनाथपुरी को जोड़ने वाली 100 फीट चौड़ी और 3 किमी लंबी सड़क बनाई थी, लेकिन बीच में करीब 900 मीटर लंबी जमीन खाली होने के बाद भी रोड अधूरी छोड़ दी। बाद में इसे विलोपित करने का निर्णय लिया तो स्थानीय कॉलोनी वालों ने विरोध कर दिया। खाली जमीन के बावजूद जेडीए सड़क नहीं बना रहा, 30 कॉलोनीवासियों को 3 किमी घूमकर आना पड़ रहा लोगों ने मकान, दुकान और गोदाम बना दिए

सीकर का मास्टर प्लान तीसरी बार बदलने की तैयारी:42 विधायकों का मास्टर प्लान मंजूर पर खुद मंत्री का अटका

राजस्थान के जोधपुर, अजमेर, उदयपुर, बीकानेर सहित 42 शहर और कस्बों के संबंधित विधायकों ने अपने इलाके के मास्टर प्लान बदलवा लिए। मंत्री की हरी झंडी भी मिल गई लेकिन, हैरानी की बात है कि यूडीएच मंत्री झाबरसिंह खर्रा के गृह जिले के शहर सीकर का मास्टर प्लान अटक गया। मास्टर प्लान पर कांग्रेस-बीजेपी में खूब तनातनी हुई, लेकिन कांग्रेस सरकार के समय बदले मास्टर प्लान का नया खाका अटक गया। खर्रा विधानसभा से लेकर कई कार्यक्रमों में सीकर मास्टर प्लान को लेकर घोषणा कर चुके हैं। इसके बाद भी मास्टर प्लान को हरी झंडी नहीं दी जा रही। इसी तरह पूर्व यूडीएच मंत्री शांति धारीवाल के कोटा शहर का मास्टर प्लान 2 बार इस सरकार में बदल दिया और नया अप्रूव कर लिया। सीएम के भरतपुर में 3 दर्जन से ज्यादा गांव मिलाकर नया मास्टर प्लान अप्रूव हो गया। लेकिन महकमे के मंत्री ही रह गया। अब सीकर का मास्टर प्लान तीसरी बार बदलने की तैयारी है। यहां के मास्टर प्लान मंजूर खाटूश्यामजी, नीम का थाना, सूरतगढ़, सीकर, पिलानी, बीकानेर, इटावा, भीनमाल, प्रतापगढ़, कपासन, महवा, देवली, रूपवास, धौलपुर, कोटा, नसीराबाद, डेगाना, खंडेला, सरदारशहर, पाली, लालसोट डूंगरपुर, गंगापुरसिटी, सुजानगढ़, श्रीगंगानगर, तिजारा, सवाईमाधोपुर, हनुमानगढ़, जोधपुर, अजमेर, मांडलगढ़, हिंडौन, भीलवाड़ा, करौली, नौखा, सिरोही, उदयपुर, सुमेरपुर, पुष्कर के विधायकों ने अपने इलाकों के मास्टर प्लान अप्रूव करा लिए। 49 जगह माइक्रो प्लान का संकट इस सरकार में ढाई साल में नए बनाए 49 शहरों के लिए तैयार किए जाने वाले मास्टर प्लान में सेक्टर और जोन स्तर की माइक्रो प्लानिंग शामिल नहीं होगी। इन शहरों के वार्डों का विकास, स्थानीय जरूरतों और बुनियादी सुविधाएं और उनकी योजना अधूरी पड़ी है। सार्वजनिक सुविधाओं, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की योजना भी अटक गई।