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सोलर पैनल होंगे सस्ते:प्रति किलोवाट 12 हजार रुपए तक कम होगी रेट, जानें- सरकार ने क्यों लिया फैसला

सोलर लगवाने वाले उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत की खबर हैं। केंद्र सरकार ने डीसीआर मॉड्यूल की अनिवार्यता लागू करने के आदेश को 6 महीने के लिए वापस ले लिया है। इससे प्रति किलोवाट लागत 12 हजार रुपए तक कम हो जाएगी। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने शनिवार शाम को एक नया आदेश जारी किया है। इसके तहत अब 31 दिसंबर 2026 तक नेट मीटरिंग और ओपन एक्सेस प्रोजेक्ट्स को नॉन-डीसीआर (Non-DCR) मॉड्यूल के जरिए भी कमीशन (चालू) करने की अनुमति दे दी गई है। सरकार के इस फैसले से अब अगले छह महीनों तक कंपनियां और उपभोक्ता अपने पुराने स्टॉक में रखे मॉड्यूल का इस्तेमाल कर सकेंगे। इससे अटके हुए प्रोजेक्ट्स पूरे सकेंगे। देशभर में अटक गए थे हजारों प्रोजेक्ट्स सरकार ने 1 जून से यह नियम लागू किया था कि बिना ALMM (अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स) वाले सोलर मॉड्यूल से बने प्रोजेक्ट्स को ग्रिड कनेक्शन नहीं दिया जाएगा। इसके कारण देशभर में हजारों रूफटॉप और ओपन एक्सेस सोलर प्रोजेक्ट्स का काम बीच में ही अटक गया था, जिससे उपभोक्ताओं और वेंडर्स दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था।
3 किलोवाट का सोलर सिस्टम 40 हजार रुपए तक हुआ था महंगा डीसीआर मॉड्यूल की अनिवार्यता लागू होने के बाद बाजार में इनकी भारी किल्लत हो गई थी, जिससे कीमतें बढ़ गई थीं। पहले जहां नॉन-डीसीआर मॉड्यूल 15 से 16 रुपए प्रति वाट की दर से मिल रहे थे, वहीं डीसीआर मॉड्यूल के दाम बढ़कर सीधे 30 से 32 रुपए प्रति वॉट तक पहुंच गए थे। इसका सीधा असर ‘प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ के लाभार्थियों पर पड़ा। इसके चलते 3 किलोवॉट का घरेलू रूफटॉप सोलर सिस्टम 35 से 40 हजार रुपए तक महंगा हो गया, यानी प्रति किलोवाट लागत में करीब 12 हजार रुपए की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस खर्च के कारण कई उपभोक्ताओं ने अपने नए प्रोजेक्ट टाल दिए और वेंडर्स के पुराने ऑर्डर भी बीच में ही अटक गए। घरों पर ढांचे तैयार, पर पैनल गायब राजस्थान में प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत 2200 से ज्यादा वेंडर्स पंजीकृत हैं, जिनमें से करीब 800 वेंडर्स अकेले जयपुर डिस्कॉम क्षेत्र में कार्यरत हैं। डीसीआर मॉड्यूल की कमी के कारण प्रदेश में हजारों घरेलू और कमर्शियल सोलर प्रोजेक्ट्स बुरी तरह प्रभावित हुए। स्थिति यह हो गई थी कि कई घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने के लिए लोहे के स्ट्रक्चर (ढांचे) तो तैयार हो गए, लेकिन मॉड्यूल की सप्लाई न होने से पैनल नहीं लग पाए। वेंडर्स का कहना है कि सप्लाई रुकने से ग्राहकों के साथ उनके विवाद बढ़ने लगे, जबकि औद्योगिक क्षेत्रों में भी हजारों मेगावाट के रूफटॉप सोलर प्रोजेक्ट अधर में लटक गए। लंबे समय के लिए चाहिए स्थायी समाधान राजस्थान सोलर एसोसिएशन के सीईओ नितिन अग्रवाल ने बताया कि सरकार ने इंडस्ट्री की व्यावहारिक समस्याओं को समझते हुए छह महीने की जो राहत दी है, उससे पहले से रुके हुए कई सोलर प्रोजेक्ट्स अब पूरे हो सकेंगे। इससे वेंडर्स और उपभोक्ताओं दोनों को बड़ी राहत मिलेगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश में अभी भी सोलर सेल का घरेलू उत्पादन मांग के अनुरूप बहुत कम है। इसलिए, सोलर इंडस्ट्री को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार को लंबे समय के लिए कोई व्यावहारिक और स्थायी समाधान निकालने की जरूरत है।

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