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100 करोड़ के हॉस्पिटल का 'फ्रेक्चर' भी नहीं दिखा:जिला प्रमुख को क्यों गिफ्ट की 'चक्की'? सड़क के बीचोंबीच 'मास्टरपीस'

नमस्कार, झुंझुनूं में डॉक्टर साहब को एक्सरे में फ्रेक्चर नहीं दिखा। दौसा के लालसोट में 100 करोड़ की लागत से बने हॉस्पिटल का ‘फ्रेक्चर’ भी किसी को नहीं दिख रहा। केंद्रीय मंत्रीजी ने आटा प्रोसेस यूनिट का उद्घाटन किया तो अलवर जिला प्रमुख को चक्की गिफ्ट की गई और भीलवाड़ा के बिजौलिया में नगरपालिका के काम का नायाब नमूना दिखा। राजनीति औ र ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खझरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. न फ्रेक्चर नजर आया न ‘दरार’ झुंझुनूं से सरकारी हॉस्पिटल में डॉक्टर साहब ने फ्रेक्चर को मामूली चोट बताकर मरीज को घर भेज दिया। मरीज का दर्द कम नहीं हुआ तो वह प्राइवेट हॉस्पिटल गया। वहां पता चला कि पसली में फ्रेक्चर है। मरीज और अटेंडेंट सरकारी डॉक्टर के पास लौटे और पूछा-आपको फ्रैक्चर नहीं दिखा? गलती स्वीकार करने के बजाए डॉक्टर ने कहा- मैं तो अनपढ़ हूं। मुझे हॉस्पिटल के बाहर निकाल दो। दरअसल, डॉक्टर साहब की गलती नहीं। पूरे हेल्थ डिपार्टमेंट की ही हालत पतली है। आप तो फ्रेक्चर की बात करते हो, दौसा के लालसोट में 100 करोड़ की लागत से सरकारी हॉस्पिटल बन गया। अस्पताल की नई बिल्डिंग में चारों तरफ लंबी दरार पड़ गई। इसका इलाज भी ढूंढ लिया गया। दरार पर एल्युमिनियम की लंबी परत लगाकर उसे ढक दिया गया। लीपापोती की हद है। पीएमओ का कहना है कि दरारों से कोई खतरा नहीं है। ये दरारें ड्रेनेज के पाइप लाइन के कारण आई हैं। प्रसूताएं भी तो 1 लाख पर 48 ही मर रही हैं। सिस्टम में कोई दरार नहीं है। सब ठीक है। 2. जिला प्रमुख को चक्की गिफ्ट आटा चक्की को लेकर श्रीलाल शुक्ल ने जो कटाक्ष ‘राग दरबारी’ में किया है, वैसा ही तंज अलवर जिला परिषद में कांग्रेस समर्थित पार्षद ने कर डाला। निर्दलीय पार्षद संदीप फौलादपुरिया अलवर जिला परिषद की साधारण सभा की मीटिंग में चक्की लेकर लेकर पहुंच गए। मीटिंग के दौरान वे उल्टी चक्की घुमाने लगे। पत्रकार ने चक्की लाने की वजह पूछी तो बोले- केंद्रीय पर्यावरण मंत्रीजी साढ़े 3 साल बाद शाहजहांपुर आए थे। सोचा था कि बहुत कुछ देकर जाएंगे। लेकिन दिया क्या? ‘आटा प्रोसेसिंग यूनिट’ यानी आटा चक्की। लोकार्पण कार्यक्रम में अलवर जिला प्रमुख बलबीर छिल्लर जी भी गए थे। तो मैं उनके लिए ये चक्की लेकर आया हूं। पत्रकार ने बात खुलासा समझाने के लिए कहा तो उन्होंने बात खुलासा समझाई। बोले- शाहजहांपुर के किसानों से नहर और पानी लाने का वादा किया गया था। नहर नहीं तो पानी नहीं, पानी नहीं तो अनाज नहीं, अनाज नहीं तो बताइये कि चक्की किस काम की? कुछ देना ही था तो ट्रोमा सेंटर देते, लैब देते, एंबुलेंस देते, बस स्टैंड पर बैठने की व्यवस्था करते। लेकिन दिया क्या? आटा चक्की। बताइये कि चक्की किस काम की? सड़कों पर जो गरीब लोग छोटा-मोटा काम धंधा लेकर बैठे थे, अतिक्रमण बताकर उनकी दुकानें तोड़ दी। लोगों के पास खाने के दाने नहीं। बताइये कि चक्की किस काम की? तो साहब हमने ये चक्की जिला प्रमुख साहब को दी है। वे इसे मंत्रीजी के पास ले जाएं और लौटा दें। कहें कि चक्की हमारे किसी काम की नहीं। 3. चलते-चलते… बिजौलिया का जिक्र हुआ तो हमें वह किसान आंदोलन याद आया जो 44 साल तक चला था। बात 130 साल पहले की है। जब किसानों ने 84 तरह के टैक्स और बेगार के खिलाफ लड़ना शुरू किया। किसान परिवार की बेटी की शादी पर भी 13 रुपए का टैक्स था। विजय सिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा और जमनालाल बजाज जैसे नेताओं ने इस लड़ाई को आगे बढ़ाया। आजादी से 6 साल पहले किसानों की जीत हुई। बेकार के टैक्स और बेगार खत्म हुई। किसानों की उस ऐतिहासिक जीत के 85 साल बाद आज बिजौलिया ऐसे स्थानीय प्रशासन के हाथों में है, जहां ये लोग एक खंभा तक ठीक से नहीं लगा पा रहे हैं। बिजौलिया नगर पालिका ने शक्करगढ़ रोड पर सरकारी कॉलेज के पास सड़क के बीचोंबीच हाईमास्ट लाइट का पोल लगवा दिया। सड़क पहले ही जर्जर और गड्‌ढों से परिपूर्ण थी। जिसके कारण हादसों की कोई कमी नहीं थी। इसके बावजूद यह खंभा बची-खुची कसर भी पूरी करने में सक्षम है। अब क्या सड़क के बीच खड़े इस मास्टरपीस को हटवाने के लिए भी बिजौलिया के लोग आंदोलन करेंगे? इनपुट सहयोग- इम्तियाज भाटी (झुंझुनूं), महेश बोहरा (लालसोट, दौसा ), साजिद शेख (अलवर), जितेंद्र सिंह नरुका (बहरोड़), धीरेंद्र सिंह (बिजौलिया, भीलवाड़ा)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।

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