साइबर ठगी 400 गुना बढ़ी:2018 में 3 केस, अब तक 1229, जबकि 10 लाख से ज्यादा के केस ही दर्ज किए
राजधानी में साइबर ठगी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। 2018 में साइबर थाने में केवल 3 मुकदमे दर्ज हुए थे। इसके बाद 8 साल में 1229 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। यानी केसों का बोझ 400 गुना तक पहुंच गया, लेकिन साइबर थाना अब भी पुराने संसाधनों के कही भरोसे है। चार कमरों के थाने में तैनात अधिकांश पुलिसकर्मी साइबर अपराध की जांच के केवल 2-3 दिन के शॉर्ट टर्म कोर्स किए हैं। एक भी स्थायी तकनीकी विशेषज्ञ नहीं है। जबकि साइबर ठग रोज नई तकनीक ला रहे हैं। ठगी की रकम कई बैंक खातों, म्यूल अकाउंट और डिजिटल वॉलेट से कुछ ही मिनटों में अलग-अलग राज्यों या देशों तक पहुंच रही है। वीपीएन और फर्जी आईपी एड्रेस से अपराधी की लोकेशन और क्रिप्टोकरेंसी से रकम को ट्रैक करना तक मुश्किल है। ऐसे में डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञ, नेटवर्क एनालिस्ट, आईपी ट्रैकिंग एक्सपर्ट, मोबाइल-लैपटॉप डेटा रिकवरी विशेषज्ञ, बैंकिंग ट्रांजेक्शन एनालिस्ट, क्रिप्टो ट्रांजेक्शन एनालिस्ट और सोशल मीडिया इंटेलिजेंस टीम की जरूरत है। सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने हाल ही दो प्रोग्रामर और एक सहायक प्रोग्रामर को अस्थायी रूप से लगाया है। 5 लाख से ज्यादा की ठगी पर केस, 10 लाख से ज्यादा के ही दर्ज कर रहे नियमों के अनुसार 5 लाख रुपए से अधिक की ऑनलाइन ठगी के मामलों की जांच साइबर थाने को करनी चाहिए। लेकिन स्टाफ और संसाधनों की कमी के कारण जयपुर साइबर थाना 10 लाख रुपए से अधिक की ठगी के मामलों को ही जांच के लिए ले रहा है। ऐसे में सवाल यह भी है कि 10 लाख रुपए से कम ठगी वाले पीड़ित कहां जाएं? वहीं 5 लाख रुपए से कम साइबर ठगी के केस संबंधित थानों में दर्ज किए जाते हैं। ऐसे मामलों की तकनीकी जांच और अंतरराज्यीय नेटवर्क तक पहुंच भी प्रभावित होने की आशंका रहती है। लॉकअप में वॉशरूम नहीं, रात में आरोपियों को विधायकपुरी थाने भेजना पड़ता है

