श्रीकृष्ण की अर्जुन को सीख:सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि सही सोच, निरंतर प्रयास और परिणाम की चिंता छोड़कर कर्म करने से मिलती है
हर व्यक्ति सफल होना चाहता है, लेकिन अक्सर काम शुरू करने से पहले ही उसके मन में सवाल उठने लगते हैं कि क्या मैं सफल हो पाऊंगा? लक्ष्य पूरा होगा या नहीं? यही चिंता कई बार व्यक्ति की क्षमता को कमजोर कर देती है। महाभारत का एक प्रसंग बताता है कि सफलता का रहस्य परिणाम की चिंता में नहीं, बल्कि पूरे मन से कर्म करने में छिपा है। दुर्योधन चाहता था कि किसी भी तरह पांडवों का अंत हो जाए। इसी उद्देश्य से उसने लाक्षागृह का षड्यंत्र रचा, लेकिन विदुर की सूझबूझ से पांचों पांडव और कुंती इस संकट से बच निकले। अपनी पहचान छिपाने के लिए वे ब्राह्मणों का वेश धारण कर वन में रहने लगे। इसी दौरान पंचाल नरेश द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर का आयोजन किया। देश-विदेश के अनेक राजा और योद्धा वहां पहुंचे। स्वयंवर की शर्त बेहद कठिन थी। प्रतियोगी को नीचे रखे पानी में प्रतिबिंब देखकर ऊपर घूम रही मछली की आंख पर निशाना लगाना था। जो इस परीक्षा में सफल होता, वही द्रौपदी का वरण करता। ब्राह्मण वेश में पहुंचे अर्जुन भी इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए आगे बढ़े। वहां श्रीकृष्ण भी उपस्थित थे उन्होंने अर्जुन को एकाग्रता, धैर्य और लक्ष्य साधने की पूरी विधि समझाई। अर्जुन ने मुस्कुराकर पूछा, “यदि सब कुछ मुझे ही करना है, तो फिर आपकी क्या आवश्यकता है?” श्रीकृष्ण ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “तुम्हारा काम अपना श्रेष्ठ प्रयास करना है। जो तुम्हारे वश में है, उसे पूरी निष्ठा से करो। जो तुम्हारे नियंत्रण से बाहर है, उसकी चिंता मुझ पर छोड़ दो। मैं हिलते हुए पानी को स्थिर कर दूंगा, ताकि तुम्हारा ध्यान केवल लक्ष्य पर रहे।” अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बात को स्वीकार किया। उन्होंने परिणाम की चिंता छोड़कर अपना पूरा ध्यान केवल लक्ष्य पर केंद्रित किया। एकाग्रता और आत्मविश्वास के साथ उन्होंने धनुष उठाया और मछली की आंख पर सटीक निशाना लगा दिया। इस प्रकार वे स्वयंवर की कठिन परीक्षा में विजयी हुए। यह प्रसंग बताता है कि सफलता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि सही सोच, निरंतर प्रयास और परिणाम की चिंता छोड़कर कर्म करने से मिलती है। जब व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ देता है, तब परिस्थितियां भी उसके पक्ष में बनने लगती हैं। इसलिए जीवन में हर कार्य पूरे समर्पण और ईमानदारी से करें, क्योंकि श्रेष्ठ कर्म ही अंततः श्रेष्ठ परिणाम का मार्ग बनाते हैं। प्रसंग की सीख

