रेगिस्तान में काक नदी के किनारे था मूमल का महल:पाकिस्तान के राजा और जैसलमेर की राजकुमारी का प्रेम; 4 एपिसोड में मूमल-महेंद्र की कहानी
जैसलमेर के लौद्रवा की राजकुमारी मूमल और अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान) के राणा महेंद्र की प्रेम कहानी सदियों पुरानी है। इस कहानी को जानने के लिए दैनिक भास्कर जैसलमेर से 14 किलोमीटर दूर लौद्रवा गांव पहुंचा, जहां मूमल के महल के खंडहर आज भी मौजूद हैं। लौद्रवा गांव में जब चौदहवीं शताब्दी के राजपूताने में घटी इस कहानी के निशान मिले तो थार की रेतीली हवाएं किसी गहरे राज की तरह दिखने लगीं। धोरों में गूंजती मूमल-महेंद्र की इस प्रेम कहानी के विरह और बलिदान को पीढ़ियां याद करती आई हैं। जानिए इस जोड़े की अमर प्रेम कहानी- लौद्रवा की राजकुमारी मूमल इतनी खूबसूरत थी कि उसकी एक झलक पाने के लिए लोग तरसते थे। मूमल जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही दिमागी पहेलियों की शौकीन भी थी। उसने अपने महल को रहस्यों से भर दिया था। मूमल के इस रहस्यमयी महल को दुनिया काक महल के नाम से जानती थी। मूमल चाहती थी कि इस महल की सीढ़ियां वही चढ़े जिसकी आंखों में मूमल के सौंदर्य से ज्यादा उसकी पहेलियों को सुलझाने का जुनून हो। राजकुमारी ने यह काक महल अपनी सहेलियों और बहनों के साथ मिलकर काक नदी के किनारे बनवाया था। काक महल का तिलिस्म लौद्रवा के इस महल की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। अलग-अलग राज्यों से राजकुमार मूमल का हाथ थामने की चाह में वहां आते, लेकिन महल के द्वार पर ही हार मान लेते। मूमल ने महल के चारों ओर दृष्टि-भ्रम का जाल बिछा रखा था। महल के सामने का आंगन नीले चमकदार संगमरमर से बना था, जो चिलचिलाती धूप में ऐसा दिखता मानो गहरा अथाह पानी लहरा रहा हो। कई शूरवीर यह सोचकर लौट जाते कि वे डूब जाएंगे। कहीं सूखी जमीन पर पानी का भ्रम था, तो कहीं फूलों की सेज के नीचे गहरा कुआं। झरोखे पर बैठी मूमल की नजरें दूर तक जाकर वापस लौट आतीं। अक्सर वह मन ही मन मुस्कुराती और खुद से बातें करती- काक महल को पार करने के लिए साहस नहीं, समझ और दिल की आंखें चाहिए। एक दिन… राजकुमारी मूमल उस दिन झरोखे पर खड़ी थी। आंखों में बुद्धिमानी की चमक लिए वह दूर क्षितिज पर आते हुए राजकुमार के काफिले को देख रही थी – एक और मुसाफिर,जो सुंदरता के मोह में बुद्धि को भूल बैठा है, मूमल मन ही मन मुस्कुरायी, उसे यकीन था कि बाकी राजकुमारों की तरह यह भी असफल होने वाला है। हुकुम, ये मारवाड़ के राजकुमार हैं। सुना है बड़े पराक्रमी हैं, मूमल के मन को पढ़ते हुए दासी ने पूरे विश्वास के साथ कहा। पराक्रम तलवारों के लिए होता है,सखी। काक महल को पार करने के लिए साहस नहीं समझ चाहिए, कहते हुए मूमल की नजर वापस उस काफिले की ओर घूम गई। महल के सामने एक राजकुमार अपने घोड़े से उतरा। उसके सामने एक पारदर्शी सा दिखने वाला आंगन था। एक मामूली महल मेरा रास्ता क्या रोकेगा! राजकुमार की भारी आवाज में आत्मविश्वास की गूंज थी। जैसे ही राजकुमार ने कदम बढ़ाया, उसे सामने गहरा पानी दिखाई दिया। इसे देख वह घबराकर पीछे हट गया। वास्तव में वहां पानी नहीं, नीले संगमरमर का ऐसा फर्श था जो पानी का भ्रम पैदा कर रहा था। राजकुमार महल के गलियारे में फंस गया। चारों तरफ शीशे लगे थे और उसे अपनी ही परछाइयां दुश्मन की तरह दिखाई दे रही थीं। उसने अपनी तलवार निकाली और भ्रम में हवा में हाथ मारने लगा। जो दिखता है वो सत्य नहीं और जो सत्य है वो इन आंखों को स्वीकार नहीं। राजकुमार, क्या आप परछाइयों से युद्ध करेंगे? मूमल की आवाज महल में गूंज उठी। लड़ते-लड़ते शाम हो चुकी थी। भूल भुलैया और पहेलियों से जूझते हुए राजकुमार पसीने से लथपथ होकर घुटनों पर बैठ गया। वह हार मान चुका था। आखिर में दासी ने राजकुमार की हार की सूचना मूमल को दी- हुकुम, ये भी असफल रहे। क्या कोई कभी इस तिलिस्म को तोड़ पाएगा? वह परेशान हो उठी। इंतजार उसी का है, जिसकी नजर मेरी खूबसूरती से ज्यादा मेरी पहेलियों की गहराई को देख सके। जिस दिन कोई बिना डरे इस काक नदी को पार करेगा, लौद्रवा का यह महल उसका स्वागत करेगा, मूमल ने चांद की ओर देखा,जैसे अपने राजकुमार के आने की मन्नत मांग रही हो। ….और फिर शुरू हुआ अमरकोट के राणा का इंतजार…एक ऐसी प्रेम कहानी का आगाज जो इतिहास के पन्नों में अमर होने वाली थी। क्या कोई राजकुमार इस तिलिस्म को पार कर मूमल तक पहुंचने में कामयाब हो सकेगा? जानिए कल के एपिसोड में- (कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। सोर्स : राजस्थानी साहित्य, लोक कथाएं व स्थानीय लोगों से बातचीत ) … राजस्थानी प्रेम कहानी की ये खबरें भी पढ़िए… 1. प्रेम कहानी जिसे शब्दों ने लिखा, रंगों ने जिंदा रखा:’बणी-ठणी’ क्या सिर्फ एक कल्पना है या वाकई कोई महिला थी? पार्ट- 1 बणी- ठणी कौन थी? ऐसा क्या था उस तस्वीर में जो राजस्थान की धरोहर बनी, जिसने किशनगढ़ शैली को दुनिया भर के कला जगत में पहचान दिलाई। जानते हैं राजा सावंत सिंह और बणी- ठणी की कहानी, जिनके प्रेम और भक्ति को कलाकार निहाल चंद ने अमर कर दिया। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए 2. खुद को कृष्ण मानते थे राजा, ‘बणी-ठणी’ को राधा:विदेशियों ने माना था भारत की मोनालिसा, ऐसा प्रेम जिसने किशनगढ़ को वृंदावन बना दिया; पार्ट–2 राजा सावंत सिंह के जीवन को भक्ति और कविता पूर्णता प्रदान करते थे, लेकिन उस दिन बणी-ठणी को सुनने के बाद उनकी साधना में अध्यात्म का एक नया और गहरा आयाम जुड़ गया था। धीरे- धीरे राजा और बणी- ठणी का रिश्ता जैसे राधा और कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम का रूपक बन गया था। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए 3- राजा ने किस महिला की बनवाई रहस्यमयी पेंटिंग:पहचान पर आज भी बहस; प्यार और सुंदरता का अद्भुत संगम, पार्ट-3 राजा सावंत सिंह और बणी-ठणी की कहानी में दोनों के श्रीकृष्ण और अध्यात्म की ओर झुकाव की विशेष भूमिका थी, जिसके चलते राजा ने बणी-ठणी में राधा की छवि को देखा था। एक शाम राजा सावंत सिंह ने निहाल चंद को बुलाया और बोले – मुझे खास चित्र बनाना है निहाल चंद। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए 4. कई दिनों बाद राजा दरबार पहुंचे तो क्या हुआ?:उन्होंने राज पाट क्यों छोड़ दिया? बणी-ठणी की अनसुनी कहानी का अंतिम अध्याय -एपिसोड 4 अब राजा सावंत सिंह का अधिकांश समय संगीत और भक्ति के आनंद में बीतने लगा था। जिसके चलते वे राजकाज, दरबार और रियासत को कम समय देने लगे। इसको लेकर दरबार में चिंता गहराने लगी। मंत्री बेचैन थे, क्योंकि राजा अब एक शासक कम, भक्त अधिक हो गए थे। पूरा पढ़ने के लिए यहां CLICK करिए

