22 और 23 जुलाई को भड़ली नवमी:आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का अंतिम दिन, देवी दुर्गा को चढ़ाएं लाल चुनरी, छोटी कन्याओं को कराएं भोजन
भड़ली नवमी इस बार तिथियों की घटने-बढ़ने के कारण 22 और 23 जुलाई दोनों दिन रहेगी। इस तिथि पर आषाढ़ गुप्त नवरात्रि भी खत्म होती है। 25 जुलाई को आने वाली देवशयनी एकादशी से पहले पड़ने वाली भड़ली नवमी को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। इसलिए इस दिन विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नया व्यापार या अन्य शुभ कार्य बिना मुहूर्त निकाले किए जा सकते हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित मनीष शर्मा के मुताबिक, भड़ली नवमी गुप्त नवरात्रि की अंतिम तिथि है। इस दिन भगवान गणेश, भगवान शिव और माता दुर्गा की विशेष आराधना का महत्व बताया गया है। साथ ही जरूरतमंद लोगों को धन, अन्न, वस्त्र, छाता, जूते-चप्पल जैसी उपयोगी वस्तुओं का दान करना चाहिए। गुप्त नवरात्रि में होती है महाविद्याओं की साधना आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में देवी सती के दस महाविद्या स्वरूपों की साधना की जाती है। यह साधना मुख्य रूप से तंत्र-मंत्र से जुड़े साधक करते हैं। इन दस महाविद्याओं में मां काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी शामिल हैं। नवरात्रि का पर्व ऋतुओं के परिवर्तन से भी जुड़ा माना जाता है। जब एक ऋतु समाप्त होती है और दूसरी शुरू होती है, उस समय को संधिकाल कहा जाता है। वर्ष में चार बार ऐसे संधिकाल में नवरात्रि आती है। आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि गर्मी और वर्षा ऋतु के बीच पड़ती है। इस दौरान पूजा-पाठ के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखने और संतुलित खान-पान अपनाने की भी सलाह दी जाती है। भड़ली नवमी के दो दिन बाद 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी रहेगी। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। इस वर्ष तिथियों के घट-बढ़ के कारण देवउठनी एकादशी 20 और 21 नवंबर दोनों दिन रहेगी। भगवान विष्णु के विश्राम काल को चातुर्मास कहा जाता है। इस अवधि में विवाह, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। करीब चार महीने तक शुभ मुहूर्त नहीं रहते, इसलिए देवशयनी एकादशी से पहले आने वाली भड़ली नवमी पर पूजा, दान और धर्म-कर्म का विशेष महत्व माना जाता है।

